
स्वस्थ्य शरीर और नियमित खानपान
आजकल लोगों को दिनभर कुछ-न-कुछ खाने की आदत हो गई है। दिन में सात-आठ बार चाय हो जाती है, कहीं जाते हैं तो एक-दो बिस्कुट खा लेते हैं, कहीं एक मुट्ठी चूड़ा खा लेते हैं, कहीं एक कोल्डड्रिंक पी लेते हैं। उससे पेट पर दबाव पड़ता है। पेट में पाचक द्रव्यों का पूरा इस्तेमाल नहीं होता । वे पेट में जमने लगते हैं, जिसके कारण पित्त, कफ, गैस वगैरह की शिकायत हो जाती है।
आश्रम में जब नए लोग आते हैं तो उन्हें शुरू-शुरू में परेशानी होती है, क्योंकि यहाँ पर भोजन का निश्चित समय है और दिन में फाँकने के लिए कुछ मिलता नहीं है। बहुत से लोग अपने साथ खाने-पीने का ढेर सारा सामान लेकर आते हैं। आधे बैग में कपड़े, आधे में खाने का सामान रहता है। मुझे याद है बचपन में एक बार आश्रम में एक महिला आई थी। वह अपने साथ बड़ा-सा बिस्कुट का डिब्बा लेकर आई थी। हमारी उम्र करीब आठ साल की रही होगी। उस डिब्बे पर हमारी नजर पड़ गई। जब वह महिला क्लास में गई थी तब उसका डिब्बा खाली कर दिया। बेचारी एक महीने के लिए पूरी व्यवस्था के साथ बिस्कुट का टिन लेकर आई थी और वह पहले दिन ही खाली हो गया! उसने बहुत हल्ला किया, "मेरे बिस्कुट कौन खा गया! " स्वामीजी को तो मालूम था कि आश्रम में कौन गड़बड़ करता है, पर चुप रहे। महिला भी समझ गई होगी, लेकिन कुछ बोल नहीं पाई। उसे भी आश्रम के अनुशासन में रहना पड़ा। जब आई थी तो भयंकर मोटी थी, जब गई तब एकदम पतली हो गई थी!
हमलोग एक नियम बना लें कि हमारे नाश्ते का यह निश्चित समय है, दिन के भोजन का यह समय है, रात के भोजन का यह समय है। रात का भोजन दस बजे क्यों न हो, किन्तु समय पर हो। यह नहीं कि आज हम पाँच बजे, तो कल सात बजे, तो परसों नौ बजे ले रहे हैं। जब इच्छा हो, तब खाने की हम लोगों की जो आदत है, वह नहीं होनी चाहिए। अगर स्वास्थ्य की कामना करते हो तो भोजन पर अनुशासन और नियंत्रण आवश्यक है। अगर जल्दी मरना चाहते हो तो खूब खाओ, बेसमय खाओ। काॅलेस्ट्राल बढ़ेगा, ह्रदय की धमनियां बन्द हो जायेंगी, ह्रदयाघात होगा, कभी भी जा सकते हो। यह एक ऐसा विषय है जिस पर हर व्यक्ति को ध्यान देना चाहिए। भोजन का समय निश्चित करना चाहिए और भोजन में पाबंदी होनी चाहिए।
एक और बात। आयुर्वेद कहता है कि ऋतु के अनुसार आहार को अगर आदमी ग्रहण करे तो वह हमेशा स्वस्थ रहेगा। लेकिन आजकल ठंडे मौसम की सब्जी कोल्ड-स्टोरेज में रखकर गर्मी में खिलाई जाती है। वह तो ऋतु का आहार नहीं है। भले ही उसका स्वाद अच्छा लगे, लेकिन शरीर पर उसका विपरीत असर पड़ेगा। आयुर्वेद का यह सिद्धांत है कि जो ऋतु-अनुसार आहार करेगा, वह स्वास्थ्य को प्राप्त करेगा।
दूसरी बात, निद्रा पर ध्यान देना है। जब बिस्तर में जाते हो तब दुनिया को साथ लेकर मत सोओ। दुनिया को बिस्तर से बाहर करके कहो कि तुम्हारे बारे में छःघण्टे बाद उठकर फिर सोचूँगा। जब बिस्तर पर लेटते हो तब इस धारणा के साथ लेटो कि मैं तनावमुक्त होकर, चिंतामुक्त होकर सो रहा हूँ और सबेरे ऊर्जायुक्त होकर उठूँगा। चिंतामुक्त और ऊर्जायुक्त। अगर नींद नहीं आती है तो लेटे-लेटे श्वास पर ख्याल करो। सौ से उल्टी गिनती करो। हो सकता है कि अस्सी तक पहुँचते-पहुँचते नींद आ जाए।
आहार और निद्रा, इन दोनों पर हर व्यक्ति को अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के अनुसार ध्यान देना चाहिए। अगर इन्हीं दोनों को हम लोग नियमित कर सकें तो बहुत-सी बीमारियों और तकलीफों से हम स्वतः मुक्त हो सकते हैं।
🌻परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती🌻
साभार :-- " यौगिक जीवन "
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