अस्तित्व की लड़ाई में भारतीय मुक्केबाजी: वर्चस्व की जंग में कहीं दम न तोड़ दें खिलाड़ियों के सपने!
”1949 से अक्टूबर 2026 तक—महासंघ का गठन, विघटन, तदर्थ समितियाँ, चुनाव, पदाधिकारी, अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ और वर्तमान सत्ता संघर्ष
लेख: संजीव दत्ता
प्रस्तावना: भारतीय मुक्केबाजी की कहानी केवल पदकों की नहीं, प्रशासनिक संघर्षों की भी है
भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास गौरव, संघर्ष, उपलब्धियों और प्रशासनिक विवादों का मिश्रण है। एक ओर इस खेल ने देश को विजेंदर सिंह, मैरी कॉम, लवलीना बोरगोहेन और अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता दिए, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय महासंघ की मान्यता, चुनाव, नेतृत्व, वित्तीय अधिकारों और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर बार-बार विवाद सामने आए।
वर्ष 1949 में Indian Amateur Boxing Federation (IABF) की स्थापना से शुरू हुआ संगठित सफर वर्ष 2012 में गंभीर संकट से गुजरा। इसके बाद Boxing India का गठन हुआ, अंतरिम समितियाँ बनीं, नई संस्था के चुनाव हुए और 2016 में Boxing Federation of India (BFI) अस्तित्व में आया।
लेकिन क्या नए महासंघ के गठन से सभी समस्याएँ समाप्त हो गईं? क्या 2012 से 2016 के बीच हुए घटनाक्रमों से स्थायी सबक लिए गए? और अक्टूबर 2026 में अध्यक्ष अजय सिंह तथा महासचिव प्रमोद कुमार के बीच सामने आए परस्पर विरोधी निलंबन आदेश भारतीय मुक्केबाजी प्रशासन के बारे में क्या संकेत देते हैं?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से देखना आवश्यक है।
भारतीय मुक्केबाजी की नींव—1925 से 1949 तक
भारत में संगठित मुक्केबाजी की शुरुआत मुंबई से मानी जाती है। वर्ष 1925 में Bombay Presidency Amateur Boxing Federation की स्थापना हुई। इसके विकास में एच. वी. पॉइंटन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसी संस्थागत प्रयास का विस्तार करते हुए 25 फरवरी 1949 को Indian Amateur Boxing Federation (IABF) की स्थापना हुई। इसकी स्थापना बैठक मुंबई स्थित Cricket Club of India के Governor's Pavilion में हुई थी। ऑस्कर एच. ब्राउन इसके पहले अध्यक्ष चुने गए, जबकि मेजर एफ. जी. बेकर पहले सचिव बने। मार्च 1950 में मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में पहली राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैंपियनशिप आयोजित हुई। शुरुआती वर्षों में महासंघ से आठ राज्य एवं संबंधित खेल इकाइयाँ जुड़ी थीं। रेलवे और एयरवेज जैसी संस्थाएँ भी इस शुरुआती व्यवस्था का हिस्सा थीं। IABF का उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का आयोजन, खिलाड़ियों की प्रतिभा को विकसित करना और भारत को अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी में प्रतिनिधित्व दिलाना था।
IABF के प्रमुख अध्यक्ष और सचिव—1949 से 2012 तक
IABF के उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड में निम्नलिखित प्रमुख पदाधिकारी दर्ज हैं। यह तालिका रिकॉर्ड में उल्लिखित वर्षों का सार है; इसे प्रत्येक वर्ष की पूर्ण पदाधिकारी सूची नहीं माना जाना चाहिए।
वर्ष | अध्यक्ष | सचिव |
1949 | ऑस्कर एच. ब्राउन | मेजर एफ. जी. बेकर |
1952 | ऑस्कर एच. ब्राउन | टेरी एडम्स |
1958 | डॉ. अमरनाथ मुखर्जी | पी. मिश्रा |
1967 | अशोक चटर्जी | पी. मिश्रा |
1972 | अशोक चटर्जी | रेक्स रीगल |
1976 | भरताना पिल्लई | डी. एन. डिवाइन जोन्स |
1980 | के. मट्टू | डी. एन. डिवाइन जोन्स |
1985 | ए. के. मट्टू | ए. डी. अडाजानिया |
1989 | ए. डी. अडाजानिया | ए. गांगुली |
1993 | ए. के. मट्टू | ए. गांगुली |
1997 | ए. के. मट्टू | राजेश भंडारी |
2001 | अभय सिंह चौटाला | राजेश भंडारी |
2005 | अभय सिंह चौटाला | कर्नल पी. के. मुरलीधरन राजा |
2008 | अभय सिंह चौटाला | कर्नल पी. के. मुरलीधरन राजा |
2009 | अभय सिंह चौटाला | राजेश भंडारी |
2012 | अभिषेक मटोरिया | राजेश भंडारी |
इस इतिहास में अभय सिंह चौटाला का अध्यक्ष के रूप में लंबा कार्यकाल और वर्ष 2012 में अभिषेक मटोरिया का अध्यक्ष बनना महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। हालाँकि, किसी पदाधिकारी के कार्यकाल का मूल्यांकन केवल उसके नाम या पद पर बने रहने की अवधि से नहीं किया जा सकता। इसके लिए संगठन की वैधता, चुनावी प्रक्रिया, वित्तीय व्यवस्था और खिलाड़ियों को मिलने वाले अवसरों का अलग-अलग विश्लेषण आवश्यक है। यही प्रश्न आगे चलकर भारतीय मुक्केबाजी के सबसे बड़े प्रशासनिक संकट का कारण बने।
वर्ष 2012 भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास का निर्णायक मोड़ था। दिसंबर 2012 में अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संस्था AIBA ने IABF को निलंबित किया। चुनावी प्रक्रिया में कथित हेरफेर और प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल उठे। इसके बाद भारत सरकार ने भी IABF की मान्यता वापस ले ली। इसका परिणाम केवल प्रशासनिक नहीं था। भारत सरकार ने 2 अगस्त 2016 को राज्यसभा में दिए गए उत्तर में बताया कि मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय खेल महासंघ के अभाव में वरिष्ठ, जूनियर और सब-जूनियर स्तर की राष्ट्रीय मुक्केबाजी प्रतियोगिताएँ आयोजित नहीं हो पा रही थीं और इसका खिलाड़ियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। यह भारतीय मुक्केबाजी के लिए गंभीर स्थिति थी। खिलाड़ियों को राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेना था, चयन प्रक्रियाओं से गुजरना था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना था। लेकिन राष्ट्रीय संगठन की मान्यता ही संकट में थी। इस घटना ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया क्या किसी खेल महासंघ के प्रशासनिक विवादों का नुकसान उन खिलाड़ियों को उठाना चाहिए जिन्होंने अपना जीवन देश के लिए पदक जीतने में लगा दिया है?
IABF की मान्यता समाप्त होने के बाद भारतीय मुक्केबाजी को संचालित करने के लिए अंतरिम व्यवस्था की आवश्यकता पड़ी। 3 अप्रैल 2014 की PTI रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने मुक्केबाजी के प्रशासन, चयन और प्रशिक्षण संबंधी मामलों को संभालने के लिए छह-सदस्यीय तदर्थ समिति बनाई। इसकी अध्यक्षता तरलोचन सिंह को सौंपी गई। समिति में राष्ट्रीय प्रशिक्षक जी. एस. संधू और भारत के AIBA प्रतिनिधि किशन नरसी भी शामिल थे। समिति को AIBA की स्वीकृति प्राप्त थी। इस व्यवस्था का घोषित उद्देश्य यह था कि IABF की मान्यता संबंधी समस्या के कारण भारतीय मुक्केबाजों और प्रशिक्षकों की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी बाधित न हो। इस समिति को 2015 में AIBA द्वारा बनाई गई समिति से अलग समझना जरूरी है। दोनों समितियों का गठन अलग-अलग समय पर और अलग परिस्थितियों में हुआ था। इस दौर का मुख्य सबक यह था कि राष्ट्रीय महासंघ की मान्यता और प्रशासनिक व्यवस्था के संकट में खिलाड़ियों की प्रतियोगिताओं तथा चयन की निरंतरता बनाए रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था आवश्यक होती है।
वर्ष 2014 में भारतीय मुक्केबाजी के प्रशासन को नई दिशा देने के लिए Boxing India (BI) का गठन किया गया। 12 सितंबर 2014 की The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, Boxing India के चुनाव मुंबई में हुए और संदीप जाजोदिया इसके पहले अध्यक्ष चुने गए। चुनाव अंतरराष्ट्रीय संस्था AIBA द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों की निगरानी में हुए थे। इस चुनाव से लगभग डेढ़ वर्ष तक चली उस स्थिति का अंत होने की उम्मीद बनी जिसमें भारतीय मुक्केबाजी का कोई स्थिर आधिकारिक निकाय नहीं था और अंतरिम व्यवस्था के सहारे काम चलाया जा रहा था। लेकिन नई संस्था को राज्य इकाइयों, अंतरराष्ट्रीय संस्था और भारतीय मुक्केबाजी परिवार के सभी वर्गों का स्थायी विश्वास प्राप्त नहीं हो सका। 2015 में Boxing India के भीतर मतभेद बढ़े। जून 2015 में AIBA ने उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा करने के लिए एक तदर्थ समिति बनाई। बाद में नवंबर 2015 में AIBA ने Boxing India की सदस्यता समाप्त कर नई राष्ट्रीय संस्था के लिए चुनाव कराने का निर्देश दिया। इससे स्पष्ट हुआ कि केवल नई संस्था बनाना पर्याप्त नहीं था। उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता, आंतरिक सहमति और स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी थी।
17 जून 2015 को AIBA ने भारत में मुक्केबाजी का संचालन व्यवस्थित करने और नए चुनावों की दिशा तय करने के लिए पाँच-सदस्यीय तदर्थ समिति बनाई।
PTI की रिपोर्ट के अनुसार, समिति की संरचना इस प्रकार थी:
पद | नाम |
अध्यक्ष | किशन नरसी |
सदस्य | जय कवली |
सदस्य | मनीषा मल्होत्रा |
सदस्य | इंजेती श्रीनिवास |
पाँचवाँ सदस्य | AIBA की स्वीकृति से नियुक्त किया जाने वाला राष्ट्रीय प्रशिक्षक |
किशन नरसी AIBA के प्रतिनिधि थे। जय कवली Boxing India के पूर्व महासचिव रह चुके थे। मनीषा मल्होत्रा पूर्व टेनिस खिलाड़ी थीं और इंजेती श्रीनिवास भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के महानिदेशक थे। राष्ट्रीय प्रशिक्षक के नाम को लेकर उपलब्ध शुरुआती रिपोर्ट में नियुक्ति बाद में किए जाने की बात कही गई थी। इस समिति का कार्य भारतीय मुक्केबाजी की स्थिति का मूल्यांकन करना, संबंधित पक्षों से संवाद करना और एक नए राष्ट्रीय महासंघ के गठन के लिए चुनावी प्रक्रिया में सहायता करना था। सितंबर 2015 में समिति ने समन्वय बोर्ड और अन्य समितियों का गठन भी किया, जिनमें पूर्व IABF अध्यक्ष असित बनर्जी और जय कवली जैसे नाम शामिल किए गए। उद्देश्य अलग-अलग गुटों को एक मंच पर लाना और खिलाड़ियों की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को जारी रखना था। यह भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास में महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रयोग था। लेकिन इसके बावजूद मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।
25 सितंबर 2016 को मुंबई में Boxing Federation of India (BFI) के चुनाव हुए। BFI की 2016–2017 की वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज प्रमुख पदाधिकारी इस प्रकार थे:
पद | नाम |
अध्यक्ष | अजय सिंह |
महासचिव | जय कवली |
कोषाध्यक्ष | हेमंत कुमार कलिता |
इसी चुनाव में आठ क्षेत्रीय उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय सचिव भी चुने गए। 28 अक्टूबर 2016 को भारत सरकार ने BFI को मुक्केबाजी के लिए राष्ट्रीय खेल महासंघ के रूप में मान्यता प्रदान की। इससे राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं, चयन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के लिए एक स्थिर संस्थागत ढाँचा स्थापित होने की उम्मीद बनी। लेकिन 2016 में BFI के गठन से पहले की संस्थाएँ और समितियाँ एक-दूसरे से अलग थीं:
- IABF पुराना राष्ट्रीय महासंघ था, जिसकी मान्यता 2012 में संकट में पड़ी।
- Boxing India 2014 में गठित हुई, लेकिन 2015 में उसकी सदस्यता समाप्त कर दी गई।
- 2014 में IOA की तदर्थ समिति और 2015 में AIBA की तदर्थ समिति अलग व्यवस्थाएँ थीं।
- BFI का गठन 2016 में चुनावों के बाद हुआ और उसे भारत सरकार की मान्यता मिली।
इन घटनाओं को एक ही संगठन का निरंतर प्रशासन मानकर प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। BFI के गठन के बाद भारत ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी को व्यवस्थित करने, प्रतियोगिताओं का आयोजन करने और खिलाड़ियों को उच्च स्तर पर तैयार करने का प्रयास जारी रखा। अजय सिंह के नेतृत्व में BFI ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के संचालन की जिम्मेदारी संभाली। जय कवली महासचिव और हेमंत कुमार कलिता कोषाध्यक्ष के रूप में शुरुआती निर्वाचित निकाय का हिस्सा थे। इसके बाद भी नेतृत्व में बदलाव, चुनाव और कार्यकाल संबंधी प्रश्न बने रहे। 2021 के बाद के चुनावी दौर में अजय सिंह अध्यक्ष बने रहे और हेमंत कुमार कलिता महासचिव की भूमिका में आए। 2025 में फिर नेतृत्व परिवर्तन हुआ। इन वर्षों में भारतीय मुक्केबाजों ने उल्लेखनीय अंतरराष्ट्रीय सफलताएँ हासिल कीं। हालाँकि, इन सफलताओं का श्रेय केवल किसी एक अध्यक्ष या महासचिव को देना उचित नहीं होगा। खिलाड़ियों के प्रदर्शन में प्रशिक्षकों, खेल संस्थानों, रेलवे और सेना जैसी सेवाओं, सरकारी सहायता, खेल विज्ञान तथा व्यक्तिगत मेहनत की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास केवल प्रशासनिक विवादों से नहीं समझा जा सकता। खिलाड़ियों की उपलब्धियाँ इस खेल की वास्तविक ताकत को दर्शाती हैं।
ओलंपिक खेल
ओलंपिक वर्ष | भारतीय मुक्केबाजी की प्रमुख उपलब्धि |
2008, बीजिंग | विजेंदर सिंह, कांस्य पदक |
2012, लंदन | मैरी कॉम, कांस्य पदक |
2016, रियो | भारत कोई मुक्केबाजी पदक नहीं जीत सका |
2020, टोक्यो | लवलीना बोरगोहेन, कांस्य पदक |
2024, पेरिस | भारत कोई मुक्केबाजी पदक नहीं जीत सका |
टोक्यो ओलंपिक 2020 का आयोजन कोविड-19 महामारी के कारण 2021 में हुआ था। इन परिणामों से स्पष्ट है कि भारत ओलंपिक मुक्केबाजी में पदक जीतने की क्षमता रखता है, लेकिन निरंतर सफलता हासिल करना अभी भी चुनौती है।
भारतीय मुक्केबाजों ने विश्व चैंपियनशिप में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। विशेष रूप से महिला मुक्केबाजी में मैरी कॉम और अन्य खिलाड़ियों ने भारत की पहचान मजबूत की। 2023 में नई दिल्ली में आयोजित महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में भारत ने चार स्वर्ण पदक जीते। यह भारतीय महिला मुक्केबाजी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप (IBA World Boxing Championships) के इतिहास में भारतीय मुक्केबाजों ने अब तक कुल 52 पदक (महिला और पुरुष चैंपियनशिप मिलाकर) जीते हैं। इसमें महिलाओं का दबदबा सबसे अधिक रहा है, जिन्होंने 14 स्वर्ण सहित 40 से अधिक पदक जीते हैं, जबकि पुरुष मुक्केबाजों ने अब तक कुल 7 पदक (1 रजत और 6 कांस्य) जीते हैं। हाल ही में संपन्न विश्व चैंपियनशिप 2025 में भी भारत ने 4 पदकों के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ विदेशी प्रदर्शन दर्ज किया है। विश्व चैंपियनशिप में भारतीय मुक्केबाजों के पदकों का वर्षवार और खिलाड़ी अनुसार मुख्य विवरण नीचे दी गई तालिकाओं में दिया गया है:
1. महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप (प्रमुख पदक विजेता)
वर्ष और स्थान | खिलाड़ी का नाम | भार वर्ग / इवेंट | प्राप्त पदक |
2025 | मीनाक्षी हुड्डा | 48 किग्रा | स्वर्ण |
2023 | निखात ज़रीन | 50 किग्रा | स्वर्ण |
2022 | निखात ज़रीन | 52 किग्रा | स्वर्ण |
2019 | मंजू रानी
| 48 किग्रा | रजत |
2018 | एम.सी. मैरीकॉम | 48 किग्रा | स्वर्ण |
2006 | एम.सी. मैरीकॉम | 46 किग्रा | स्वर्ण |
2002, 2005, 2008, 2010 | एम.सी. मैरीकॉम | विभिन्न भार वर्ग | 4 स्वर्ण |
एशियाई खेलों में भारतीय मुक्केबाजों ने कई पदक जीते हैं। 2023 के हांगझोऊ एशियाई खेलों में लवलीना बोरगोहेन ने स्वर्ण पदक जीता।
एशियन गेम्स में भारतीय मुक्केबाजी पदक विजेता (वर्षवार विवरण)
वर्ष और स्थान | खिलाड़ी का नाम | भार वर्ग / इवेंट | प्राप्त पदक |
2026 | अंकुश पंघाल | पुरुषों का 80 किग्रा | स्वर्ण |
2023 | लवलीना बोरगोहाइन | महिलाओं का 75 किग्रा | रजत |
2018 | अमित पंघाल | पुरुष लाइट फ्लाईवेट (49 किग्रा) | स्वर्ण |
2014 | एम.सी. मैरीकॉम | महिला फ्लाईवेट (51 किग्रा) | स्वर्ण |
2010 | विकास कृष्ण यादव | पुरुष लाइटवेट (60 किग्रा) | स्वर्ण |
2006 | विजेंदर सिंह | पुरुष मिडिलवेट (75 किग्रा) | कांस्य |
1998 | डिंग्को सिंह | पुरुष बैंटमवेट (54 किग्रा) | स्वर्ण |
1994 | गुरमीत सिंह | पुरुष हेवीवेट (91 किग्रा) | रजत |
1990 | गोपाल देवांग | पुरुष लाइट वेलटरवेट (63.5 किग्रा) | कांस्य |
1986 | जयपाल सिंह | पुरुष सुपर हेवीवेट (+91 किग्रा) | रजत |
1982 | कौर सिंह | पुरुष हेवीवेट (91 किग्रा) | स्वर्ण |
1978 | हरि सिंह | पुरुष मिडिलवेट (75 किग्रा) | रजत |
1974 | मेजर सिंह | पुरुष लाइट हेवीवेट (81 किग्रा) | रजत |
1970 | हवा सिंह | पुरुष हेवीवेट (+81 किग्रा) | स्वर्ण |
1966 | हवा सिंह | पुरुष हेवीवेट (+81 किग्रा) | स्वर्ण |
1962 | पद्म बहादुर मल्ल | पुरुष लाइटवेट (60 किग्रा) | स्वर्ण |
दिल्ली में 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाजों ने तीन स्वर्ण और चार कांस्य पदक जीते। मनोज कुमार, सुरंजय सिंह, विजेंदर सिंह और परमजीत समोटा सहित खिलाड़ियों की उपलब्धियों ने भारत की स्थिति मजबूत की। इसके बाद भी राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाजों ने कई पदक हासिल किए।
राष्टमंडल खेलों (Commonwealth Games) के इतिहास में भारतीय मुक्केबाजों का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा है. भारत ने इस प्रतियोगिता में अब तक कुल 64 पदक (25 स्वर्ण, 19 रजत और 20 कांस्य) जीते हैं. हाल ही में ग्लासगो में संपन्न राष्टमंडल खेल 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड 7 स्वर्ण और 3 रजत पदकों के साथ पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया, राष्टमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाजों द्वारा जीते गए पदकों का वर्षवार और खिलाड़ी अनुसार विवरण नीचे दी गई तालिका में दिया गया है:
राष्ट्रमंडल खेल: भारतीय मुक्केबाजी पदक विजेता (वर्षवार विवरण)
वर्ष और स्थान | खिलाड़ी का नाम | भार वर्ग / इवेंट | प्राप्त पदक |
2026 | साक्षी चौधरी | महिला 51 किग्रा | स्वर्ण |
2022 | नीतू घंघास | महिला मिनिममवेट (48 किग्रा) | स्वर्ण |
2018 | एम.सी. मैरीकॉम | महिला 48 किग्रा | स्वर्ण |
2014 | विजेंदर सिंह | पुरुष मिडिलवेट (75 किग्रा) | रजत |
2010 | सुरंजय सिंह | पुरुष 52 किग्रा | स्वर्ण |
2006 | अखिल कुमार | पुरुष 54 किग्रा | स्वर्ण |
2002 | मोहम्मद अली कमर | पुरुष लाइट फ्लाईवेट (49 किग्रा) | स्वर्ण (CWG इतिहास का पहला स्वर्ण) |
1990 | धर्मेद्र सिंह यादव | पुरुष लाइट फ्लाईवेट (48 किग्रा) | रजत |
1974 | चंद्रन नारायणन | पुरुष फ्लाईवेट (51 किग्रा) | कांस्य |
1970 | शिवाजी भोंसले | पुरुष वेलटरवेट (69 किग्रा) | कांस्य (CWG इतिहास का पहला पदक)
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इन उपलब्धियों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाली प्रतिभाओं की कमी नहीं है। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जो इन प्रतिभाओं को लगातार विश्व और ओलंपिक स्तर तक पहुँचने में मदद करे।
21 अगस्त 2025 को BFI के चुनाव हुए। Hindustan Times और Times of India की रिपोर्टों के अनुसार, अजय सिंह तीसरी बार अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने सिक्किम इकाई के जस लाल प्रधान को 40–26 मतों से हराया। महासचिव पद पर उत्तर प्रदेश के प्रमोद कुमार निर्वाचित हुए। उन्होंने मध्य प्रदेश के दिग्विजय सिंह को 36–30 मतों से हराया। इस प्रकार उन्होंने हेमंत कुमार कलिता का स्थान लिया। कोषाध्यक्ष पद पर पोन बास्करन निर्वाचित हुए। उन्होंने अनिल कुमार बोहिदार और आर. गोपू को पीछे छोड़ा। चुनाव की निगरानी सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजेश टंडन ने की, जबकि World Boxing की ओर से फेयरुज मोहम्मद पर्यवेक्षक के रूप में जुड़े थे। यह चुनाव महत्वपूर्ण था क्योंकि अध्यक्ष और महासचिव अलग-अलग पदों पर निर्वाचित हुए और महासंघ की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ नए नेतृत्व के बीच बाँटी गईं। लेकिन चुनाव के बाद भी संविधान में संशोधनों और कुछ राज्य इकाइयों की आपत्तियों से संबंधित कानूनी प्रश्न बने रहने की खबरें सामने आईं। इसलिए चुनाव संपन्न होने को सभी प्रशासनिक विवादों के अंतिम समाधान के समान नहीं माना जा सकता।
अक्टूबर 2026 में भारतीय मुक्केबाजी महासंघ के भीतर विवाद ने नया रूप ले लिया। इस घटनाक्रम को समझने के लिए तीन दस्तावेजी आधार महत्वपूर्ण हैं:
- 13 अक्टूबर 2026 का अध्यक्ष अजय सिंह द्वारा जारी प्रमोद कुमार के निलंबन का आदेश।
- 14 अक्टूबर 2026 का प्रमोद कुमार द्वारा जारी अजय सिंह के निलंबन का पत्र।
- BFI की ओर से जारी स्पष्टीकरण, जिसमें प्रमोद कुमार की कार्रवाई को अधिकारहीन बताया गया।
13 अक्टूबर 2026: प्रमोद कुमार का अंतरिम निलंबन
अजय सिंह द्वारा हस्ताक्षरित आदेश में प्रमोद कुमार को महासचिव के पद के कार्यों से तत्काल प्रभाव से अंतरिम रूप से निलंबित करने की बात कही गई है। आदेश में कहा गया है कि 10 अक्टूबर को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और 12 अक्टूबर को जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय देने का नोटिस जारी हुआ था। अजय सिंह के आदेश के अनुसार, प्रमोद कुमार ने निर्धारित समय में संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। आदेश में मुख्य आरोप निम्नलिखित हैं।
पहला—Pinnacle Broadcast Productions से जुड़ा वित्तीय विवाद।
आदेश के अनुसार, कंपनी ने नवंबर 2025 में ग्रेटर नोएडा में हुए World Boxing Finals Cup के प्रसारण के संबंध में BFI से लगभग ₹1.5 करोड़ का दावा किया।
अजय सिंह के आदेश में कहा गया है कि कंपनी ने 11 नवंबर 2025 के एक कार्यादेश का हवाला दिया, जो कथित तौर पर प्रमोद कुमार के ईमेल और हस्ताक्षर से जारी हुआ था। आदेश में यह भी दावा किया गया है कि महासचिव के वित्तीय अधिकार ₹1 लाख तक सीमित थे और कार्यादेश को वित्त समिति से स्वीकृति नहीं मिली थी। ये आरोप जाँच के अधीन बताए गए हैं। इन्हें अंतिम रूप से सिद्ध वित्तीय अनियमितता या धोखाधड़ी नहीं माना जाना चाहिए।
दूसरा—राष्ट्रीय चैंपियनशिप रद्द होने की जाँच।
आदेश में कहा गया है कि 16 से 23 अगस्त 2026 तक हिमाचल प्रदेश के नाहन में प्रस्तावित BFI Elite Men & Women Open Boxing Championship 2026 रद्द होने के मामले में 17 अगस्त को जाँच समिति गठित की गई थी। आदेश के अनुसार, समिति ने प्रमोद कुमार को 13 सितंबर को नोटिस दिया था और उनसे उत्तर माँगा गया था।
तीसरा—नोटिस, अविश्वास प्रस्ताव और प्रशासनिक अधिकार।
अजय सिंह के आदेश में आरोप लगाया गया कि प्रमोद कुमार ने वरिष्ठ पदाधिकारियों को नोटिस जारी किए, अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के लिए बैठक बुलाने की कोशिश की और महासंघ के प्रशासनिक अधिकारों को लेकर विवाद पैदा किया। आदेश में संविधान संशोधनों की वैधता पर उनके रुख और सार्वजनिक बयानों पर भी सवाल उठाए गए हैं। आदेश में संविधान की धाराओं 24(xvi), 24(xxviii), 24(xxxvi) और 30 का हवाला दिया गया है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि निलंबन अंतरिम सुरक्षात्मक कदम है, अंतिम निर्णय नहीं।
14 अक्टूबर 2026: प्रमोद कुमार का अजय सिंह के विरुद्ध आदेश
दूसरी ओर, 14 अक्टूबर 2026 के पत्र में प्रमोद कुमार ने अजय सिंह को अध्यक्ष के पद से निलंबित करने की बात कही। इस पत्र में अध्यक्ष पर एकतरफा प्रशासनिक निर्णय लेने, संविधान में संशोधन की प्रक्रिया, वित्तीय सवालों और न्यायालय के निर्देशों के पालन को लेकर आरोप लगाए गए हैं। पत्र में 28 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित विशेष आम बैठक में अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान तक निलंबन की व्यवस्था का उल्लेख है। ये आरोप भी स्वतंत्र जाँच या सक्षम प्राधिकरण के निष्कर्ष के बिना सिद्ध तथ्य नहीं माने जा सकते।
BFI का स्पष्टीकरण: बैठक बुलाने और निलंबन के अधिकार पर विवाद
BFI के स्पष्टीकरण में कहा गया है कि संविधान की धारा 26(iii) के अनुसार महासचिव अध्यक्ष की सलाह पर सामान्य परिषद और कार्यकारी परिषद की बैठकें बुलाता है। महासंघ का दावा है कि यह प्रावधान महासचिव को अपने स्तर पर किसी भी समय विशेष आम बैठक बुलाने का असीमित अधिकार नहीं देता। BFI ने धारा 33(ii) का उल्लेख करते हुए कहा कि विशेष आम बैठक अध्यक्ष अपने विवेक से या कार्यकारी परिषद के दो-तिहाई सदस्यों के लिखित अनुरोध पर बुला सकता है। महासंघ का यह भी कहना है कि महासचिव को अध्यक्ष को स्वतंत्र रूप से निलंबित करने का अधिकार नहीं है और 14 अक्टूबर का पत्र अधिकृत आदेश नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन इस विवाद का निष्पक्ष निर्णय करने के लिए BFI के संविधान का पूरा प्रमाणित पाठ, संबंधित बैठकों की कार्यवाही, नोटिस, अनुमोदन रिकॉर्ड और दोनों आदेशों के कानूनी आधार की जाँच आवश्यक है। किसी पदाधिकारी द्वारा आदेश जारी कर देना और उस आदेश का संवैधानिक रूप से वैध होना दो अलग-अलग प्रश्न हैं। इसी प्रकार, किसी पदाधिकारी के विरुद्ध आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना भी अलग-अलग बातें हैं। इसलिए वर्तमान विवाद में किसी एक पक्ष को पहले से दोषी या सही घोषित करना उचित नहीं होगा।
क्या भारतीय मुक्केबाजी का प्रशासनिक इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
1949 में IABF की स्थापना से लेकर 2012 के मान्यता संकट, 2014 में Boxing India के गठन, 2015 की तदर्थ समिति और 2016 में BFI की स्थापना तक एक बात स्पष्ट दिखाई देती है, राष्ट्रीय मुक्केबाजी को स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता हमेशा रही है। 2012 में मान्यता का संकट खिलाड़ियों के लिए राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और अंतरराष्ट्रीय अवसरों को प्रभावित करने वाला साबित हुआ। 2014–2015 में नई संस्था और तदर्थ समितियों के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास हुआ। 2016 में BFI को मान्यता मिली। इसके बाद खिलाड़ियों ने अनेक अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, लेकिन चुनाव, कार्यकाल, संविधान, वित्तीय अधिकार और नेतृत्व को लेकर विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। अक्टूबर 2026 में अध्यक्ष और महासचिव के एक-दूसरे के विरुद्ध निलंबन आदेशों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि क्या महासंघ के संविधान में निर्धारित अधिकारों और प्रक्रियाओं को सभी पक्ष समान रूप से स्वीकार कर रहे हैं? इसका उत्तर आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, नियमों और निष्पक्ष समीक्षा से ही मिल सकता है।
भारतीय मुक्केबाजी में बार-बार विवाद होने के संभावित कारण
इतिहास के आधार पर कुछ प्रशासनिक क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
1. चुनाव और कार्यकाल
2012 में IABF की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठे। बाद के वर्षों में नए महासंघ के गठन और चुनावों में भी मतभेद सामने आए।
इसलिए चुनावों की समय-सीमा, मतदाता सूची, पात्रता, परिणाम और कार्यकाल की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।
2. अधिकारों का स्पष्ट विभाजन
अध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष और कार्यकारी समिति के अधिकार स्पष्ट होने चाहिए। यदि अधिकारों की सीमाएँ अस्पष्ट हों या उनका पालन न हो, तो विवाद बढ़ सकते हैं।
3. वित्तीय पारदर्शिता
प्रायोजन, प्रसारण अधिकार, कार्यादेश, भुगतान और अन्य वित्तीय समझौतों के लिए स्पष्ट अनुमोदन प्रक्रिया होनी चाहिए। वित्तीय प्रतिबद्धताओं का रिकॉर्ड और आवश्यक लेखा-परीक्षण उपलब्ध होना चाहिए।
4. राज्य इकाइयों का प्रतिनिधित्व
राज्य इकाइयाँ राष्ट्रीय महासंघ का आधार हैं। उनकी शिकायतों, चुनावी अधिकारों और प्रतिनिधित्व के लिए स्पष्ट प्रक्रिया आवश्यक है।
5. स्वतंत्र जाँच और अपील
यदि किसी पदाधिकारी के विरुद्ध आरोप लगते हैं, तो जाँच निष्पक्ष होनी चाहिए। संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए और अंतिम निर्णय की समीक्षा के लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
6. खिलाड़ियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता
प्रशासनिक विवादों के कारण राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ, चयन, प्रशिक्षण शिविर या अंतरराष्ट्रीय भागीदारी प्रभावित न हों—यह सुनिश्चित करना महासंघ की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है।
संपादिका :- डॉ. सपना दत्ता
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बहुत सत्य पड़ताल अच्छा लेख
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