सीमित संसाधनों से विश्व विजय तक अनूप कुमार की तपस्या और भारतीय महिला बॉक्सिंग का स्वर्णिम दौर
जिस दौर में भारतीय महिला मुक्केबाजी पहचान की तलाश में थी, उसी दौर में अनूप कुमार ने बेटियों की मुट्ठियों में विश्व-विजय का विश्वास पैदा किया
भारतीय खेल इतिहास में कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पदकों, ट्रॉफियों और चैंपियनशिप की संख्या से नहीं आँका जा सकता। उन यात्राओं के पीछे सीमित संसाधनों में किया गया अथक परिश्रम, वर्षों की तपस्या, खिलाड़ियों पर अटूट विश्वास और राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून छिपा होता है। भारतीय महिला मुक्केबाजी के विकास की कहानी भी ऐसी ही एक प्रेरणादायी यात्रा है। आज जब भारतीय महिला मुक्केबाज विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ उतरती हैं, तब यह याद करना जरूरी है कि एक समय ऐसा भी था जब देश में महिला मुक्केबाजी को अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। इसी संक्रमणकाल में अनूप कुमार ने भारतीय महिला मुक्केबाजी को नई दिशा दी। उन्होंने खिलाड़ियों को केवल मुक्केबाजी की तकनीक नहीं सिखाई, बल्कि उनमें यह विश्वास पैदा किया कि भारतीय बेटियाँ विश्व की सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाजों को चुनौती दे सकती हैं और उन्हें पराजित भी कर सकती हैं। उनकी साधना का परिणाम था कि भारतीय महिला मुक्केबाजी ने एशिया से लेकर विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक तक अपनी मजबूत पहचान बनाई। वर्ष 2004 में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वे भारतीय महिला मुक्केबाजी के प्रथम द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच के रूप में स्थापित हुए।
अनूप कुमार का जन्म 1956 में सादुलपुर, जिला चूरू, राजस्थान में हुआ। उनके व्यक्तित्व में ग्रामीण परिवेश की सादगी, अनुशासन और संघर्षशीलता प्रारंभ से दिखाई देती रही। उनके पिता स्वर्गीय श्री राम रतन सहारण अपने समय के स्नातक थे और ब्लॉक विकास अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए। चार भाइयों में सबसे बड़े होने के कारण बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारियों और नेतृत्व की भावना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रा सहारण गृहिणी हैं। अनूप कुमार के लंबे प्रशिक्षण शिविरों, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और लगातार व्यस्त खेल जीवन के दौरान उन्होंने परिवार को मजबूती से संभाला। उनके पुत्र का नाम रवि सहारण है। परिवार का यह सहयोग ही वह आधार बना, जिस पर अनूप कुमार ने अपना पूरा जीवन भारतीय खेल को समर्पित कर दिया।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद अनूप कुमार ने जाट कॉलेज, हिसार से 1978-79 में स्नातक तथा गवर्नमेंट कॉलेज, हिसार से 1980-81 में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। खेल के मैदान पर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। 1977 और 1978 की ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिताओं में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और कोलकाता में पदक जीतकर उन्होंने यह साबित किया कि उनमें प्रतियोगी मुक्केबाजी की क्षमता मौजूद है। इसके बाद 1983-84 में NIS पटियाला से प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए उन्हें भारतीय मुक्केबाजी के दिग्गज प्रशिक्षकों स्वर्गीय श्री ओ. पी. भारद्वाज और श्री जी. एस. संधू जैसे गुरुओं से सीखने का अवसर मिला। यहीं से उनके जीवन में खिलाड़ी से प्रशिक्षक बनने की दिशा स्पष्ट हुई। जयपुर के एसएमएस स्टेडियम से उनकी कोचिंग यात्रा आगे बढ़ी और बाद में दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाजों को तैयार किया। वर्ष 1990 से 2001 तक उन्होंने अनेक प्रतिभाओं को तराशा उनके प्रशिक्षण से राम खिलाड़ी यादव, ओंकार, धर्मेंद्र, महावीर सिंह, बलवीर और वर्ष 2016 के द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता सागर मल धायल जैसे मुक्केबाजों ने अपनी पहचान बनाई। लेकिन उनके कोचिंग जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अभी शुरू होना बाकी था।
वर्ष 2001 में अनूप कुमार को भारतीय महिला बॉक्सिंग टीम का मुख्य प्रशिक्षक बनाया गया। यह वह समय था जब महिला मुक्केबाजी भारत में अभी अपनी जड़ें मजबूत कर रही थी। अनूप कुमार ने इस चुनौती को केवल एक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि एक मिशन के रूप में स्वीकार किया। उनकी सोच स्पष्ट थी, यदि भारतीय महिला मुक्केबाजों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएँ और वैज्ञानिक प्रशिक्षण हर समय उपलब्ध नहीं हैं, तो प्रशिक्षण में अनुशासन, रणनीति, मानसिक मजबूती और आत्मविश्वास की कमी नहीं होनी चाहिए। यही सोच धीरे-धीरे परिणामों में दिखाई देने लगी। द्वितीय एशियाई महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप, हिसार, भारतीय महिला मुक्केबाजी के इतिहास में महत्वपूर्ण अध्याय बनी। भारतीय मुक्केबाजों ने प्रतियोगिता में 3 स्वर्ण, 2 रजत और 6 कांस्य सहित कुल 11 पदक हासिल किए। स्वर्ण पदक जीतने वाली मुक्केबाजों में अरुणा मिश्रा, ज्योत्स्ना और जेनी प्रमुख थीं। प्रतियोगिता में भारत चैंपियनशिप खिताब से केवल तीन अंकों से पीछे रह गया। अनूप कुमार को इसका मलाल जरूर था, लेकिन उन्होंने खिलाड़ियों के प्रदर्शन और मेहनत की खुलकर सराहना की। यह केवल पदकों का परिणाम नहीं था। यह भारतीय महिला मुक्केबाजी के आत्मविश्वास का निर्माण था। अरुणा मिश्रा ने अपनी सफलता का श्रेय अनूप कुमार के अथक मार्गदर्शन को दिया। वहीं ज्योत्स्ना ने अपने मुकाबले में शानदार जीत के बाद इसे अनूप सर के कठिन अभ्यास का परिणाम बताया। इन खिलाड़ियों की प्रतिक्रियाएँ बताती हैं कि कोच और खिलाड़ी के बीच केवल प्रशिक्षण का संबंध नहीं था, वहाँ विश्वास का रिश्ता था।
भारतीय महिला मुक्केबाजी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सफलता दिलाने के परिणामस्वरूप 2004 में अनूप कुमार को द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके व्यक्तिगत कोचिंग जीवन की उपलब्धि भर नहीं था। यह भारतीय महिला मुक्केबाजी के उस संघर्ष की भी राष्ट्रीय मान्यता थी, जिसमें उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका नाम भारतीय महिला मुक्केबाजी के इतिहास में प्रथम द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच के रूप में दर्ज हुआ। यदि अनूप कुमार के कोचिंग जीवन की उपलब्धियों को किसी एक प्रतियोगिता में समेटना हो तो 2006 की नई दिल्ली विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक होगी। भारतीय महिला मुक्केबाजों ने इस प्रतियोगिता में 4 स्वर्ण, 1 रजत और 3 कांस्य कुल 8 पदक जीतकर विश्व मंच पर अपना दबदबा कायम किया। एम. सी. मैरी कॉम, एल. सरिता देवी, अरुणा मिश्रा और अश्वथी जैसी मुक्केबाजों के प्रदर्शन ने भारतीय महिला मुक्केबाजी को विश्व पटल पर नई पहचान दी। उस समय के समाचार पत्रों में भारतीय प्रदर्शन को लेकर ऐसी सुर्खियाँ प्रकाशित हुईं, जिनमें भारत के पंच को विश्व में सर्वश्रेष्ठ बताया गया और भारतीय टीम की सफलता को कोच की उपलब्धियों से जोड़ा गया। यह वह दौर था जब भारतीय महिला मुक्केबाजी ने दुनिया को यह संदेश देना शुरू किया कि भारत की बेटियाँ केवल भाग लेने नहीं, बल्कि जीतने के लिए रिंग में उतरती हैं।
अनूप कुमार की कोचिंग की सबसे बड़ी विशेषता केवल उनकी तकनीकी समझ नहीं थी। खिलाड़ियों के अनुसार वे उनके लिए कोच के साथ-साथ अभिभावक भी थे। पूर्व भारतीय मुक्केबाज कनक दुर्गा, जो वर्तमान में विशाखापत्तनम रेलवे में कार्यरत हैं, अनूप कुमार के प्रशिक्षण शिविरों को याद करते हुए बताती हैं कि वे खिलाड़ियों की सेहत, भोजन और व्यक्तिगत समस्याओं तक का ध्यान रखते थे। राष्ट्रीय शिविर में किसी खिलाड़ी को चिकित्सकीय सहायता की जरूरत होती तो अनूप कुमार स्वयं उसके साथ चिकित्सक के पास जाते थे। उनके लिए खिलाड़ी केवल रिंग में उतरने वाला मुक्केबाज नहीं था। वह एक इंसान था, जिसके स्वास्थ्य, परिवार, भविष्य और मानसिक स्थिति की भी उतनी ही चिंता आवश्यक थी।
अनूप कुमार के व्यक्तित्व को समझने के लिए कविता गोयात की कहानी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हिसार ग्राउंड पर कविता नियमित रूप से आती थीं, लेकिन घुटने की चोट के कारण अभ्यास नहीं कर पा रही थीं। अनूप कुमार ने समस्या को समझा और इलाज कराने का जिम्मा उठाया। उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण, हिसार के अधिकारियों से संपर्क कर कविता के उपचार की व्यवस्था कराने में मदद की। इलाज के बाद कविता ने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीता और इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय शिविर तक पहुँचने का अवसर मिला। इसके बाद कविता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध की। 2008 एशियाई चैंपियनशिप में उन्होंने चीन की मुक्केबाज को हराकर रजत पदक जीता। 2010 ग्वांगझोउ एशियाई खेलों में उन्होंने कजाकिस्तान की विश्व विजेता मुक्केबाज को पराजित कर कांस्य पदक हासिल किया लेकिन कविता की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। 2012 में हरियाणा पुलिस में उनकी नियुक्ति के बाद भी अनूप कुमार का सहयोग जारी रहा। 2013 में उनकी शादी हुई और 2014 में उन्हें पुत्र रतन की प्राप्ति हुई पुत्र के जन्म के बाद खेल जारी रखना उनके लिए कठिन था। ऐसे समय में भी अनूप कुमार ने उन्हें खेल से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित किया और राष्ट्रीय शिविर में छोटे बच्चे को साथ रखने की व्यवस्था कराने में सहयोग किया। यह केवल एक खिलाड़ी को पदक दिलाने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें महिला खिलाड़ी के मातृत्व और खेल जीवन को एक दूसरे का विरोधी नहीं माना गया। आज कविता गोयात हरियाणा के करनाल में SHO के रूप में कार्यरत हैं। उनकी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि एक संवेदनशील गुरु किसी खिलाड़ी का केवल खेल जीवन ही नहीं, बल्कि पूरा जीवन बदल सकता है।
अनूप कुमार ने खिलाड़ियों के भविष्य को केवल रिंग तक सीमित नहीं रखा उन्होंने रेलवे स्पोर्ट्स प्रमोशन बोर्ड के अधिकारियो से महिला मुक्केबाजो को रेलवे में भर्ती करने के लिए प्रयास किया, रेलवे में उन्होंने महिला मुक्केबाजों को रोजगार और खेल के बीच सुरक्षित भविष्य देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनके विशेष आग्रह पर ज्योत्स्ना, कर्मजीत और छोटू लोरा को रेलवे में नियुक्ति का अवसर मिला। इन नियुक्तियों ने आगे आने वाली महिला मुक्केबाजों के लिए रास्ते खोले। रेलवे जैसी संस्थाओं में खेल के माध्यम से रोजगार मिलने से महिला खिलाड़ियों को आर्थिक सुरक्षा मिली और परिवारों में भी बेटियों को खेलों में भेजने का विश्वास बढ़ा।
अनूप कुमार के कार्यकाल को भारतीय महिला मुक्केबाजी के उस दौर से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जब एम. सी. मैरी कॉम जैसी प्रतिभा विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रही थीं। मैरी कॉम का 2001 में विश्व रजत और 2002 में विश्व स्वर्ण पदक जीतना भारतीय महिला मुक्केबाजी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं। बाद के वर्षों में भारतीय महिला मुक्केबाजों ने विश्व और एशियाई प्रतियोगिताओं में लगातार सफलता हासिल की। 2010 ग्वांगझोउ एशियाई खेलों में महिला मुक्केबाजी के एशियाई खेल पदार्पण के दौरान मैरी कॉम और कविता गोयात के कांस्य पदक ने भारतीय महिला मुक्केबाजी की स्थिति और मजबूत की। इसके बाद 2012 लंदन ओलंपिक में महिला मुक्केबाजी के ओलंपिक पदार्पण ने भारतीय खेल इतिहास में नया अध्याय जोड़ा। मैरी कॉम ने कांस्य पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया। 2014 के एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों में भी भारतीय महिला मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन किया। इन उपलब्धियों ने भारतीय महिला मुक्केबाजी को उस मुकाम तक पहुँचाया, जहाँ से पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं रही।
अनूप कुमार के लगभग डेढ़ दशक लंबे राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण काल को भारतीय महिला मुक्केबाजी के निर्माण के एक महत्वपूर्ण दौर के रूप में देखा जा सकता है। इस अवधि में भारतीय महिला मुक्केबाजो ने विश्व में अपनी नई पहचान बनाई
- भारतीय महिला मुक्केबाजों ने विश्व और एशियाई प्रतियोगिताओं में पदक जीते।
- 2004 में अनूप कुमार को द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला।
- 2006 नई दिल्ली विश्व चैंपियनशिप में भारत ने 8 पदक जीते और पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया।
- 2010 एशियाई खेलों में महिला मुक्केबाजी के पदार्पण पर भारत ने पदक जीते।
- 2012 लंदन ओलंपिक में महिला मुक्केबाजी के पदार्पण पर मैरी कॉम ने कांस्य पदक जीता।
- 2014 में भारतीय महिला मुक्केबाजों ने एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
यह उपलब्धियाँ उस मजबूत नींव की गवाही थीं, जिसे अनेक प्रशिक्षकों, खिलाड़ियों और खेल प्रशासकों के साथ अनूप कुमार जैसे प्रशिक्षकों ने वर्षों की मेहनत से तैयार किया।
वर्ष 2016 में राष्ट्रीय टीम के मुख्य प्रशिक्षक पद से विदाई के बाद भी अनूप कुमार ने खेल को अलविदा नहीं कहा। उन्होंने अपने गृह क्षेत्र में अपने संसाधनों से निजी अकादमी स्थापित की। यह अकादमी आगे चलकर खेलो इंडिया से भी संबद्ध हुई। यहाँ से दानिश, निकिता, कल्पना, अंजू, नेहा, राशि, गजल और रीना जैसी युवा प्रतिभाओं ने राष्ट्रीय और विश्वविद्यालय स्तर पर पदक जीतने शुरू किए। यह इस बात का प्रमाण है कि अनूप कुमार के लिए मुक्केबाजी का प्रशिक्षण देना कोई सरकारी पद या नौकरी भर नहीं था। यह उनके जीवन का मिशन है। वर्ष 2017 में जॉर्डन से उन्हें मुख्य कोचिंग से जुड़ा आकर्षक प्रस्ताव मिला। किसी भी प्रशिक्षक के लिए यह सम्मान और अवसर का विषय हो सकता था, लेकिन अनूप कुमार ने उसे स्वीकार नहीं किया। उनकी प्राथमिकता थी, अपने देश में रहकर ग्रामीण क्षेत्रों और नई भारतीय प्रतिभाओं को तराशना। यह निर्णय उनके राष्ट्रप्रेम और खेल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। उन्होंने विदेश में व्यक्तिगत सफलता के बजाय भारत की अगली पीढ़ी के निर्माण को चुना।
एक महान कोच की पहचान केवल उसके द्वारा जीते गए पदकों से नहीं होती। उसकी असली पहचान उन खिलाड़ियों में दिखाई देती है, जिन्हें उसने स्वयं से आगे बढ़ते हुए देखा। अनूप कुमार की विरासत मैरी कॉम, सरिता देवी, कविता गोयात, कनक दुर्गा, अरुणा मिश्रा, ज्योत्स्ना, पिंकी जांगड़ा और उन अनेक मुक्केबाजों की उपलब्धियों में दिखाई देती है, जिन्हें उन्होंने प्रशिक्षण, अनुशासन और आत्मविश्वास दिया। उन्होंने खिलाड़ियों को यह सिखाया कि संसाधनों की कमी प्रतिभा की सीमा नहीं होती। उन्होंने भारतीय बेटियों को यह विश्वास दिया कि रिंग चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो, मुकाबला कितना भी कठिन क्यों न हो और सामने प्रतिद्वंद्वी कितना ही मजबूत क्यों न हो भारत की बेटी जीतने का साहस रखती है। सादुलपुर की मिट्टी से शुरू हुई यह यात्रा राष्ट्रीय शिविरों, एशियाई चैंपियनशिप, विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक तक पहुँची। अनूप कुमार की कहानी इसलिए केवल एक कोच की जीवनी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब भारतीय महिला मुक्केबाजी ने संघर्ष से पहचान, पहचान से आत्मविश्वास और आत्मविश्वास से विश्व विजय तक का सफर तय किया। और इस यात्रा में एक गुरु की आवाज लगातार सुनाई देती रही “विश्वास रखो, मेहनत करो और रिंग में भारत के लिए लड़ो।” यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। यही उनकी सबसे बड़ी तपस्या है, और यही भारतीय महिला मुक्केबाजी के स्वर्णिम दौर में उनकी अमिट विरासत है।
लेखक :- संजीव दत्ता
संपादिका :- डॉ. सपना दत्ता
दूरभाष :- 9971999864
प्रायोजन के लिए /For sponsorship : khelkhiladi55@gmail.com





Wonderful Dutta Shab.You mention each and every Biggning History of Women Boxing very clearly.Big Big Appreciateble your Knowledge of Writing the ground realities..Pray God very soon you became one of the topest Sports journalist in our Country.
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