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भारतीय मुक्केबाजी के भीष्म पितामह स्वर्गीय ओम प्रकाश भारद्वाज जिन्होंने मुक्केबाज ही नहीं, मुक्केबाजी की पूरी पीढ़ियां तैयार कीं

भारतीय मुक्केबाजी के भीष्म पितामह स्वर्गीय ओम प्रकाश भारद्वाज जिन्होंने मुक्केबाज ही नहीं, मुक्केबाजी की पूरी पीढ़ियां तैयार कीं

 


भारतीय खेल इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका मूल्यांकन केवल उनके जीते हुए पदकों, प्राप्त पुरस्कारों या पदों से नहीं किया जा सकता। वे स्वयं एक संस्था बन जाते हैं। उनका जीवन एक ऐसी पाठशाला बन जाता है, जहां से निकलने वाले खिलाड़ी और प्रशिक्षक आने वाली पीढ़ियों को दिशा देते हैं। स्वर्गीय श्री ओम प्रकाश भारद्वाज भारतीय मुक्केबाजी के ऐसे ही युगपुरुष थे। भारतीय मुक्केबाजी में उन्हें सम्मानपूर्वकभीष्म पितामह कहा जाता है। यह संबोधन किसी औपचारिक सम्मान का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों की तपस्या, त्याग, अनुशासन और भारतीय बॉक्सिंग के निर्माण में उनके असाधारण योगदान की स्वाभाविक स्वीकृति है। वे भारतीय मुक्केबाजी के पहले द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित प्रशिक्षक थे। वर्ष 1985 के द्रोणाचार्य पुरस्कार की पहली सूची में बॉक्सिंग के लिए ओम प्रकाश भारद्वाज का नाम शामिल था। उसी ऐतिहासिक वर्ष कुश्ती में बी. बी. भागवत और एथलेटिक्स में . एम. नांबियार भी इस प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित हुए। भारत सरकार की सूची में भी ओम प्रकाश भारद्वाज का नाम 1985 के द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेताओं में दर्ज है। लेकिन द्रोणाचार्य पुरस्कार उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं थी। उनकी असली उपलब्धि थी उनके द्वारा तैयार की गई वह मुक्केबाजी पीढ़ी, जिसने भारत को ओलंपिक, एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप, किंग्स कप, विश्व प्रतियोगिताओं और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गौरवान्वित किया।

    ओम प्रकाश भारद्वाज का जन्म 18 मार्च 1942 को पिंड सहारन, गुजरांवाला टाउन, पाकिस्तान में हुआ। उनके पिता का नाम श्री केशो राम भारद्वाज था। उनके द्वारा स्वयं लिखे गए जीवन-परिचय के अनुसार, उन्होंने मात्र 14 वर्ष की आयु में वर्ष 1957 में बॉक्सिंग की शुरुआत की। उस समय वे सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर, जबलपुर की बॉयज बटालियन से जुड़े हुए थे। जिस उम्र में अधिकांश बच्चे खेल को केवल मनोरंजन और शारीरिक गतिविधि के रूप में देखते हैं, उसी उम्र में ओम प्रकाश भारद्वाज ने मुक्केबाजी को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने विभिन्न सर्विसेज एवं बॉयज बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में भाग लिया और राज्य तथा सर्विसेज स्तर पर कई महत्वपूर्ण खिताब अपने नाम किए। उनकी प्रतिभा, अनुशासन और निरंतर अभ्यास ने उन्हें कम उम्र में ही एक प्रतिभाशाली मुक्केबाज के रूप में पहचान दिलाई। वर्ष 1967 में उन्होंने आर्मी स्कूल ऑफ फिजिकल ट्रेनिंग, पुणे में एडवांस कोर्स किया। इस प्रशिक्षण के दौरान उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें ‘बेस्ट बॉक्सर’ घोषित किया गया। यह उपलब्धि उनके खेल जीवन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। इसी दौर में उनके भीतर यह विश्वास और अधिक मजबूत हुआ कि बॉक्सिंग उनके लिए केवल एक खेल नहीं, बल्कि जीवन का मिशन है। उनके पारिवारिक जीवन की बात करें तो वर्ष 1966 में उनका विवाह कुमारी संतोष से हुआ। उनके परिवार में बड़ी पुत्री रंजना सेखरी हैं, जो हांगकांग में रहती हैं। उनके बड़े पुत्र राजेश भारद्वाज जो ऑस्ट्रेलिया में पुलिस विभाग में कार्यरत हैं, जबकि छोटे पुत्र रमन भारद्वाज स्पाइसजेट एयरलाइंस में कार्यरत हैं। ओम प्रकाश भारद्वाज के जीवन की यह प्रारंभिक यात्रा इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने बचपन से ही अनुशासन, संघर्ष और खेल के प्रति समर्पण को अपने जीवन का आधार बनाया। आगे चलकर यही अनुभव भारतीय बॉक्सिंग में उनके खिलाड़ी, प्रशिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में योगदान की मजबूत नींव बने।

भारद्वाज जी की खेल यात्रा भारतीय सेना से गहराई से जुड़ी रही। वर्ष 1957 में उन्होंने इंडियन आर्मी के कॉर्प्स ऑफ सिग्नल में प्रवेश किया। वर्ष 1957 से 1966 तक उन्होंने सैन्य सेवा में रहते हुए बॉक्सिंग की और बाद में वर्ष 1967 से 1976 तक आर्मी स्कूल ऑफ फिजिकल ट्रेनिंग, पुणे में बॉक्सिंग स्पेशलिस्ट के रूप में कार्य किया। उन्होंने आर्मी के विभिन्न प्रतिष्ठानों में बॉक्सिंग कोच के रूप में सेवाएं दीं सिग्नल ट्रेनिंग सेंटर जबलपुर, आर्मी स्कूल ऑफ फिजिकल ट्रेनिंग पुणे, पंजाब रेजिमेंट सेंटर मेरठ, इंडियन मिलिट्री अकादमी देहरादून तथा 39 गोरखा ट्रेनिंग सेंटर सहित अनेक स्थानों पर उन्होंने खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया। उनकी सैन्य पृष्ठभूमि ने उनके प्रशिक्षण दर्शन में अनुशासन, कठोर परिश्रम और समयबद्धता को विशेष स्थान दिया। उनके लिए बॉक्सर का फिट होना पर्याप्त नहीं था,  उसे मानसिक रूप से भी मजबूत होना चाहिए।

प्रशिक्षण के लिए देश विदेश की श्रेष्ठ पद्धतियों का अध्ययन किया केवल परंपरागत प्रशिक्षण तक सीमित रहने वाले कोच नहीं थे। उन्होंने स्वयं को लगातार शिक्षित किया और आधुनिक प्रशिक्षण पद्धतियों को समझने का प्रयास किया। उनके स्वंय के लिखे लेख अनुसार उन्होंने आर्मी स्कूल ऑफ फिजिकल ट्रेनिंग, पुणे से बॉक्सिंग इंस्ट्रक्टर कोर्स किया। उन्होंने एडवांस फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर कोर्स भी किया और उसमें -एक्स ग्रेडिंग तथा बेस्ट स्टूडेंट का सम्मान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स, पटियाला से 1976 में बॉक्सिंग कोचिंग में डिप्लोमा हासिल किया। उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ में बॉक्सिंग का अध्ययन किया तथा पूर्वी जर्मनी में बॉक्सिंग कोचिंग का डिप्लोमा प्राप्त किया, जहां वे सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी भी चुने गए। यह अध्ययन उनके प्रशिक्षण दर्शन की व्यापकता को दर्शाता है। वे जानते थे कि अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग में भारतीय मुक्केबाजों को आगे ले जाने के लिए केवल मेहनत पर्याप्त नहीं है, तकनीक, फिटनेस, रणनीति और वैज्ञानिक प्रशिक्षण का समन्वय भी जरूरी है।

ओम प्रकाश भारद्वाज की सबसे दूरगामी उपलब्धियों में से एक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स, पटियाला में बॉक्सिंग विभाग की स्थापना और कोच तैयार करने की व्यवस्था थी। अपने स्वंय लिखित लेख  में उन्होंने स्वयं उल्लेख किया कि वर्ष 1975 में उन्होंने देश के लिए बॉक्सिंग कोच तैयार करने वाले बॉक्सिंग विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि उन्होंने केवल खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने का काम नहीं किया, बल्कि कोच बनाने की प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया। अर्थात् वे केवल खिलाड़ी के गुरु नहीं थे, वे गुरुओं के भी गुरु थे। यही वह कारण है कि उनकी विरासत को केवल उनके द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ियों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। उनके द्वारा प्रशिक्षित प्रशिक्षकों ने आगे हजारों खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया और भारतीय बॉक्सिंग की जड़ें देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचीं।


ओम प्रकाश भारद्वाज के 1968 से 1991 तक भारतीय राष्ट्रीय बॉक्सिंग टीम के कोचिंग तंत्र से जुड़े रहे। इस लंबे कालखंड में उन्होंने सर्विसेज, सेंट्रल कमांड और राष्ट्रीय टीमों के साथ काम किया। उनके कार्यकाल में सेंट्रल कमांड और सर्विसेज टीमों ने लगातार सर्विसेज तथा राष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। यह वह समय था जब भारतीय बॉक्सिंग विश्व की स्थापित शक्तियों के सामने अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। सीमित संसाधनों के बीच भारतीय मुक्केबाजों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था। भारद्वाज जी ने इसी चुनौती को स्वीकार किया। उनकी ओलंपिक से एशियाई खेलों तक भारतीय टीम के साथ लंबी यात्रा में दर्ज रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने भारतीय बॉक्सिंग टीम के साथ अनेक बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में कोच के रूप में जिम्मेदारी निभाई। वे भारतीय टीम के साथ ,म्यूनिख ओलंपिक 1972 ,मॉन्ट्रियल ओलंपिक 1976, मास्को ओलंपिक 1980, लॉस एंजिल्स ओलंपिक 1984, सियोल ओलंपिक 1988, से जुड़े रहे। उनकी कोचिंग यात्रा राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों, एशियाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप, किंग्स कप, प्रेसिडेंट्स कप, दक्षिण एशियाई खेलों तथा अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक फैली हुई थी। उन्होंने 20 बार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए भारतीय राष्ट्रीय बॉक्सिंग टीम के साथ कोच के रूप में भाग लिया। पदकों का ऐसा सिलसिला, जो उनके कोचिंग कौशल की गवाही देता है,उनके  प्रशिक्षण काल का रिकॉर्ड केवल लंबा नहीं था, बल्कि अत्यंत प्रभावशाली भी था। 1980 के बॉम्बे एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत ने 2 स्वर्ण, 3 रजत और 5 कांस्य सहित शानदार प्रदर्शन किया। 1982 के सियोल एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारतीय टीम ने उल्लेखनीय पदक जीते। 1987 के तीसरे SAF Games, कलकत्ता में उनके प्रशिक्षण से भारतीय टीम ने 9 स्वर्ण, 1 रजत और 2 कांस्य पदक जीते और टीम चैंपियनशिप में प्रथम स्थान हासिल किया। 1981 के मिनी कॉमनवेल्थ गेम्स में चार भारतीय मुक्केबाजों ने 2 स्वर्ण, 1 रजत और 1 कांस्य जीता। ये आंकड़े केवल पदकों की सूची नहीं हैं। वे उस दौर में एक कोच की रणनीति, चयन क्षमता और प्रशिक्षण पद्धति की सफलता का प्रमाण हैं।

अर्जुन पुरस्कार विजेताओं की लंबी सूची गुरु की सबसे बड़ी विरासत है ओम प्रकाश भारद्वाज के जीवन का शायद सबसे गौरवपूर्ण अध्याय उनके द्वारा प्रशिक्षित अर्जुन पुरस्कार विजेता मुक्केबाजों की लंबी सूची है। उनके स्वयं लिखे प्रमाणित विवरण में ऐसे 17 मुक्केबाजों के नाम दर्ज हैं, जिन्हें उन्होंने राष्ट्रीय/सर्विसेज कोच के रूप में वर्षों तक प्रशिक्षित किया और जिन्होंने बाद में अर्जुन पुरस्कार प्राप्त किया।

 

इस सूची में शामिल हैं,

  1. डी. स्वामी                  1968
  2. एम. वेणु                     1971
  3. सी. नारायण                1972
  4. मेहताब सिंह               1974
  5. बी. एस. थापा                1978
  6. सी. सी. मचैया              1979
  7. बख्शी सिंह                 1980
  8. आई. अमलदास           1981
  9. जी. मनोहरन               1982
  10. कौर सिंह                   1983
  11. जस्लाल प्रधान             1984
  12. जय पाल सिंह               1986
  13. सीरा जयराम               1987
  14. गोपाल देवान               1989
  15. राजेंद्र प्रसाद               1989
  16. किल्लेकर                  1990
  17. मनोज प्रसाद               1990

यह सूची अपने आप में भारतीय बॉक्सिंग के एक स्वर्णिम दौर की कहानी है। एक कोच के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि उसके प्रशिक्षित खिलाड़ी एक के बाद एक राष्ट्रीय खेल सम्मान प्राप्त करें भारद्वाज जी के प्रशिक्षित खिलाड़ियों ने केवल पुरस्कार नहीं जीते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रिंग में भारत का गौरव बढ़ाया। उनकी कोचिंग से तैयार खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों, एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक हासिल किए। उनके प्रशिक्षण की विशेषता यह थी कि वे केवल स्थापित खिलाड़ियों के साथ काम नहीं करते थे। वे ग्रासरूट से प्रतिभा तलाशने में विश्वास रखते थे। भारतीय एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन के एक प्रमाण-पत्र में भी स्पष्ट रूप से कहा गया कि भारद्वाज ने खिलाड़ियों को ग्रासरूट स्तर से तैयार किया और उन्हें सर्विसेज, राष्ट्रीय तथा संस्थागत चैंपियन बनाया। उसी प्रमाण-पत्र में उन्हें भारतीय बॉक्सिंग का बॉक्सिंग गुरु कहा गया है।

एक गुरु से दूसरे गुरु तक द्रोणाचार्य की परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके प्रशिक्षण से निकले कई खिलाड़ी आगे चलकर स्वयं प्रशिक्षक बने। भारतीय बॉक्सिंग के द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेताओं की आधिकारिक सूची में बाद के वर्षों में जयदेव बिष्ट सहित अनेक प्रशिक्षकों के नाम आते हैं। इस प्रकार भारद्वाज जी की शिक्षाएं केवल एक खिलाड़ी तक सीमित नहीं रहीं। उनके प्रशिक्षण की विचारधारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती गई। यही किसी महान गुरु की वास्तविक पहचान है वह स्वयं समाप्त नहीं होता, उसके विचार उसके शिष्यों में जीवित रहते हैं। 1985  जब गुरु को मिला द्रोणाचार्य का सम्मान भारतीय खेल इतिहास का ऐतिहासिक वर्ष था। भारत सरकार ने प्रशिक्षकों के योगदान को राष्ट्रीय सम्मान देने के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार शुरू किया। पहली सूची में ओम प्रकाश भारद्वाज को बॉक्सिंग के लिए चुना गया। 20 नवंबर 1986 को भारत सरकार के युवा कार्य एवं खेल विभाग के उप सचिव आर. एन. गुप्ता का पत्र भी सुरक्षित है, जिसमें उन्हें वर्ष 1985 के द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए चयनित होने पर हार्दिक बधाई दी गई है। पत्र में बताया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। भारतीय ओलंपिक संघ के तत्कालीन अध्यक्ष विद्याचरण शुक्ल ने भी 12 दिसंबर 1986 को भेजे पत्र में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार मिलने पर बधाई देते हुए उनके खिलाड़ियों का स्तर उठाने के लिए किए गए सतत प्रयासों को इस सम्मान का उचित आधार बताया। इस प्रकार द्रोणाचार्य पुरस्कार केवल एक ट्रॉफी नहीं था। यह उस गुरु की राष्ट्रीय मान्यता थी, जिसने अपना जीवन खिलाड़ियों के निर्माण में लगा दिया।

सेना से लेकर राष्ट्रपति भवन तक उनकी सम्मान यात्रा केवल द्रोणाचार्य पुरस्कार तक सीमित नहीं रही।

  • जनरल मानेकशॉ द्वारा बेस्ट बॉक्सिंग कोच अवार्ड
  • महाराष्ट्र एमेच्योर बॉक्सिंग एसोसिएशन का बेस्ट बॉक्सिंग कोच अवार्ड
  • द्रोणाचार्य पुरस्कार, 1985
  • एशिया के सर्वश्रेष्ठ बॉक्सिंग कोच का सम्मान, 1986
  • दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा प्राइड ऑफ तिलक नगर सम्मान
  • दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना द्वारा सम्मान

इन सम्मानों की लंबी सूची बताती है कि उनके योगदान को सेना, खेल संगठनों, राज्य सरकार और राष्ट्रीय खेल व्यवस्था सभी स्तरों पर मान्यता मिली। बेस्ट कोच ऑफ एशियाभारत के लिए गौरव का पल था जब वर्ष 1986 में उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ बॉक्सिंग कोच का सम्मान मिला। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एशिया में उस समय मुक्केबाजी की कई मजबूत परंपराएं थीं। ऐसे वातावरण में भारतीय कोच का महाद्वीपीय स्तर पर श्रेष्ठता हासिल करना भारतीय खेल प्रशिक्षण की बड़ी उपलब्धि थी। यह सम्मान उस दौर में भारतीय बॉक्सिंग की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और भारद्वाज जी की व्यक्तिगत प्रशिक्षण क्षमता दोनों को दर्शाता है।

भारद्वाज जी के प्रभाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण उनके निजी संग्रह में सुरक्षित समाचार-पत्रों के लेख भी हैं। 1990 में प्रकाशित “Bring back Bhardwaj”  शीर्षक का समाचार-पत्र लेख भारतीय मुक्केबाजी में उनके योगदान और राष्ट्रीय टीम के प्रदर्शन को लेकर चिंता व्यक्त करता है। लेख में भारतीय बॉक्सिंग के प्रदर्शन, राष्ट्रीय कोचिंग और टीम की दिशा पर चर्चा करते हुए भारद्वाज को वापस लाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।  यह बात अपने आप में बहुत बड़ी है। किसी कोच की नियुक्ति या पद पर चर्चा होना सामान्य बात है, लेकिन जब खेल जगत में यह आवाज उठे किभारतीय बॉक्सिंग को बेहतर दिशा देने के लिए भारद्वाज को वापस लाया जाए, तो यह उस प्रशिक्षक की प्रतिष्ठा का प्रमाण बन जाता है। समाचार-पत्रों की नजर में The man behind the boxing medals’ उनके संग्रह में प्रकाशित एक अन्य लेख का शीर्षक था “The man behind the boxing medals”। यह शीर्षक ही भारद्वाज जी के पूरे जीवन का सार प्रस्तुत करता है। मुक्केबाज रिंग में उतरता है, पंच लगाता है, मुकाबला जीतता है और पदक हासिल करता है। लेकिन उस पदक के पीछे जिस व्यक्ति की महीनों और वर्षों की मेहनत होती है, उसका चेहरा अक्सर दर्शकों से दूर रहता है। भारद्वाज जी ऐसे ही पदकों के पीछे के व्यक्ति थे। समाचार-पत्र में उनके शुरुआती खेल जीवन, सेना से जुड़ाव, कोचिंग उपलब्धियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित खिलाड़ियों का उल्लेख किया गया था। वर्ष 2005 में प्रकाशित Indian Express के लेख “Knockout blow for Indian boxing”  में ओम प्रकाश भारद्वाज ने भारतीय बॉक्सिंग की स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने भारतीय मुक्केबाजी में गिरते प्रदर्शन, प्रशासनिक व्यवस्था और कोचों की भूमिका को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खेल के प्रति ईमानदार और समर्पित प्रशिक्षकों की आवश्यकता है तथा बॉक्सिंग को आगे बढ़ाने के लिए सही लोगों को जिम्मेदारी मिलनी चाहिए। यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष सामने लाता है। वे केवल अतीत के गौरव में जीने वाले कोच नहीं थे। वे भारतीय बॉक्सिंग के वर्तमान और भविष्य को लेकर भी उतने ही चिंतित रहते थे। विदेशी कोचों के प्रश्न पर भी स्पष्ट दृष्टिकोण रखने वाले उनके संग्रह में प्रकाशित एक अन्य समाचार-पत्र लेख “Foreign coaches fail to … in boxing” में भी भारद्वाज जी के विचार सामने आते हैं। वे भारतीय बॉक्सिंग की समस्याओं का समाधान केवल विदेशी प्रशिक्षकों में नहीं देखते थे। उनका जोर भारतीय प्रतिभा, प्रशिक्षकों की जवाबदेही, उचित व्यवस्था और देश में उपलब्ध क्षमता को सही दिशा देने पर था। उनकी सोच स्पष्ट थी भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है उसे पहचानने, प्रशिक्षित करने और सही अवसर देने वाली व्यवस्था की। यह विचार आज भी भारतीय खेल व्यवस्था के लिए उतना ही प्रासंगिक है।

खिलाड़ी ही नहीं, खेल पत्रकारिता और प्रसारण से भी जुड़ाव भारद्वाज जी की बहुआयामी प्रतिभा का एक पक्ष यह भी था कि वे दूरदर्शन के लिए खेल कमेंटेटर के रूप में भी कार्य करते थे। वे खेल कमेंट्री के लिए स्वीकृत टीवी कमेंटेटर थे और कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में कमेंट्री कर चुके थे। उन्होंने बॉक्सिंग और कंडीशनिंग प्रशिक्षण पर लघु फिल्मों के लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में भी काम किया तथा दूरदर्शन के लिए प्रशिक्षण संबंधी सामग्री तैयार की। उन्होंने भारतीय बॉक्सिंग के भविष्य पर अनेक लेख लिखे। उनके लेखों के विषयों में I

  • Future of Indian Boxing
  • China May Upset All Calculation
  • In Modern Sports It Is Not Possible to Excel Without Hard Work
  • Foreign Coaches Do Not Stress on Conditioning
  • Recreation Activities is Must in Sports
  • Only Young Boxers Can Achieve Top Performance
  • Indian Boxing Comes of Age
  • Conditioning Plays Vital Role in Boxing

जैसे विषय शामिल थे, इससे पता चलता है कि वे केवल कोच नहीं थे, वे बॉक्सिंग के गंभीर चिंतक और विश्लेषक भी थे।

उनकी विचारधारा का एक सूत्र था कठोर परिश्रम के बिना उत्कृष्टता संभव नहीं उन्होंने आधुनिक खेल प्रशिक्षण में कंडीशनिंग की भूमिका पर लगातार जोर दिया। उनका मानना था कि बॉक्सर की तकनीक तभी प्रभावी हो सकती है, जब उसके शरीर में पूरे मुकाबले तक गति, शक्ति और सहनशक्ति बनाए रखने की क्षमता हो। वे युवा खिलाड़ियों को अधिक अवसर देने के पक्षधर थे और मानते थे कि युवा अवस्था में सही प्रशिक्षण मिलने पर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। उनके संग्रह में प्रकाशित हिंदी लेखखेलों में राजनीति के दखल से नाराज हैं देश के द्रोणाचार्य भी उनके विचारों की गंभीरता को दर्शाता है। इस लेख में भारद्वाज जी ने खेल में अनावश्यक हस्तक्षेप और व्यवस्था में पारदर्शिता की आवश्यकता को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी। वे चाहते थे कि खिलाड़ी और प्रशिक्षक खेल को केंद्र में रखकर काम करें और खेल व्यवस्था में योग्यता, अनुशासन तथा निष्पक्षता को महत्व मिले। उनका स्पष्ट मानना था कि खिलाड़ी की मेहनत और प्रतिभा से समझौता नहीं होना चाहिए।


भारद्वाज जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे खिलाड़ी की प्रतिभा को केवल राष्ट्रीय शिविर में आने के बाद नहीं देखते थे। भारतीय एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन के प्रमाण-पत्र में उल्लेख है कि उन्होंने खिलाड़ियों को ग्रासरूट स्तर से तैयार कर सर्विसेज, राष्ट्रीय और संस्थागत चैंपियन बनाया। उन्हें भारतीय बॉक्सिंग का Boxing Guru” बताते हुए फेडरेशन ने कहा कि वे देश के किसी भी हिस्से में होने वाली बॉक्सिंग गतिविधि में कोच, अधिकारी या टीवी कमेंटेटर के रूप में सहयोग के लिए उपस्थित रहते थे। यही कारण है कि उनका योगदान किसी एक शहर, संस्था या टीम तक सीमित नहीं था। एक खिलाड़ी की उपलब्धि उसके करियर के साथ समाप्त हो सकती है, लेकिन एक गुरु की उपलब्धि उसके शिष्यों में जीवित रहती है। ओम प्रकाश भारद्वाज के मामले में यह बात अक्षरशः सत्य है। उनके प्रशिक्षण से निकले मुक्केबाजों में अनेक अर्जुन पुरस्कार विजेता बने। उनके खिलाड़ियों ने ओलंपिक, एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके द्वारा तैयार खिलाड़ियों और आगे प्रशिक्षक बने उनके शिष्यों ने भारतीय बॉक्सिंग की परंपरा को आगे बढ़ाया। यही वह श्रृंखला है, जिसके कारण एक व्यक्ति का योगदान दशकों बाद भी देश की खेल उपलब्धियों में दिखाई देता है। आज भारत की मुक्केबाजी जब विश्व चैंपियन, ओलंपिक पदक विजेता, एशियाई चैंपियन और राष्ट्रमंडल चैंपियन तैयार करती है, तब उस यात्रा की शुरुआती मजबूत ईंटें रखने वाले गुरुओं को याद करना आवश्यक है। उनमें ओम प्रकाश भारद्वाज का स्थान अत्यंत ऊंचा है। गुरु की असली पहचान शिष्य की सफलता से होती है ओम प्रकाश भारद्वाज का जीवन हमें गुरु-शिष्य परंपरा का आधुनिक खेल संस्करण दिखाता है। द्रोणाचार्य स्वयं धनुर्धर नहीं थे, लेकिन उन्होंने अर्जुन को महान बनाया। ठीक उसी प्रकार ओम प्रकाश भारद्वाज स्वयं रिंग में उतरकर हर मुकाबला नहीं लड़ते थे, लेकिन उन्होंने ऐसे मुक्केबाज तैयार किए जिन्होंने भारत की ओर से रिंग में उतरकर दुनिया को अपनी प्रतिभा दिखाई। उनके लिए खिलाड़ी की जीत केवल खिलाड़ी की जीत नहीं थी।

वह गुरु की जीत थी। वह प्रशिक्षण की जीत थी। वह भारतीय मुक्केबाजी की जीत थी। और अंततः वह भारत की जीत थी। एक जीवन, जिसने हजारों जीवनों को दिशा दी यदि ओम प्रकाश भारद्वाज के जीवन को कुछ शब्दों में समेटना हो तो वे शब्द होंगे ,अनुशासन, समर्पण, ज्ञान, कठोर परिश्रम, प्रतिभा की पहचान, और राष्ट्र के लिए खेल। 14 वर्ष की आयु में बॉक्सिंग शुरू करने वाला एक युवा आगे चलकर भारतीय बॉक्सिंग का सबसे सम्मानित गुरु बना। सेना के रिंग से शुरू हुई यात्रा राष्ट्रीय टीम तक पहुंची। राष्ट्रीय टीम से ओलंपिक तक पहुंची, ओलंपिक से एशियाई और विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंची, और अंततः एक ऐसे मुकाम पर पहुंची जहां भारत सरकार ने उन्हें देश के पहले द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता बॉक्सिंग प्रशिक्षक के रूप में सम्मानित किया।


उनका शरीर भले ही 21 मई 2021 को इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन भारतीय बॉक्सिंग के प्रति उनकी चिंता और उनका योगदान आज भी जीवित है। वे जीवन के अंतिम वर्षों तक भारतीय बॉक्सिंग के प्रदर्शन, प्रशिक्षण व्यवस्था और खिलाड़ियों के भविष्य पर विचार करते रहे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा खेल-गुरु पद या पुरस्कार मिलने के बाद रुकता नहीं है। वह तब भी सीखता है, तब भी सोचता है, तब भी सवाल करता है, और तब भी अगली पीढ़ी के लिए रास्ता तलाशता है।

ओम प्रकाश भारद्वाज—एक नाम नहीं, एक मुक्केबाजी परंपरा स्वर्गीय ओम प्रकाश भारद्वाज भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि पूरी पुस्तक हैं।  उन्होंने मुक्केबाजी खेली, मुक्केबाज तैयार किए, कोच तैयार किए, राष्ट्रीय टीमों को प्रशिक्षण दिया, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का मार्गदर्शन किया, प्रतिभाओं को ग्रासरूट से उठाया, प्रशिक्षण की वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाया, बॉक्सिंग पर लिखा, टीवी पर इसकी व्याख्या की और जीवन के अंतिम दौर तक भारतीय बॉक्सिंग के भविष्य की चिंता की। उनका सबसे बड़ा सम्मान द्रोणाचार्य पुरस्कार था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनके शिष्य थे। उनके स्वयं लिखे दस्तावेज में दर्ज 17 अर्जुन पुरस्कार विजेता मुक्केबाजों की सूची इस बात की गवाही देती है कि उन्होंने किस विराट स्तर पर खिलाड़ियों को तैयार किया। भारतीय ओलंपिक संघ के पत्र में उनके सतत प्रयासों से देश के खिलाड़ियों का स्तर उठाने की प्रशंसा की गई। भारतीय एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन ने उन्हें “Boxing Guru” कहा। और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है। पदक विजेता मुक्केबाजों की चमक रिंग की रोशनी में दिखाई देती है, लेकिन उस चमक के पीछे जिस गुरु की वर्षों की तपस्या होती है, वह अक्सर पर्दे के पीछे रहता है। ओम प्रकाश भारद्वाज उसी तपस्या के प्रतीक थे। उन्होंने भारत को केवल मुक्केबाज नहीं दिए उन्होंने भारत को मुक्केबाजी की संस्कृति दी उन्होंने केवल चैंपियन नहीं बनाए उन्होंने चैंपियन बनाने वाले गुरु तैयार किए उन्होंने केवल पदक नहीं दिलाए उन्होंने भारतीय तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय रिंग में सम्मान दिलाया। इसीलिए भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास में उनका नाम सदैव आदर से लिया जाएगा ओम प्रकाश भारद्वाज भारतीय मुक्केबाजी के भीष्म पितामह, पहले द्रोणाचार्य, और अनगिनत चैंपियनों के गुरु।” उनकी विरासत आज भी हर उस मुक्केबाज की मुट्ठी में जीवित है, जो भारत का तिरंगा लेकर रिंग में उतरता है। उनकी स्मृति भारतीय मुक्केबाजी के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।

ओम प्रकाश भारद्वाज का जीवन एक संदेश है महान खिलाड़ी पदक जीतते हैं, लेकिन महान गुरु पीढ़ियां जीतते हैं।


संपादक :-  संजीव दत्ता

दूरभाष :- 9971999864

प्रायोजन के लिए /For sponsorship : khelkhiladi55@gmail.com 

3 Responses to "भारतीय मुक्केबाजी के भीष्म पितामह स्वर्गीय ओम प्रकाश भारद्वाज जिन्होंने मुक्केबाज ही नहीं, मुक्केबाजी की पूरी पीढ़ियां तैयार कीं"

  1. The legendary boxing coach of India

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  2. He was a great all time boxer, grass roots tallent hunter, time bound thinker for competition, excellent commentator and devoted with integrity. A big salute... He will in the history of Indian boxing.

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