शाहपुर जाट से निकला वह खिलाड़ी, जिसने खेल को बनाया जीवन का मिशन आज 100 से अधिक युवा मुक्केबाजों को दे रहे प्रशिक्षण
मनोज पवार की बॉक्सिंग यात्रा संघर्ष, समर्पण और सफलता की प्रेरक कहानी
नई दिल्ली। खेल प्रतिभा अक्सर बड़े शहरों की चमकदार अकादमियों में नहीं, बल्कि छोटे मैदानों, सीमित संसाधनों और संघर्षों के बीच जन्म लेती है। जरूरत होती है तो सिर्फ ऐसे मार्गदर्शक की, जो उस प्रतिभा को पहचान सके, उसे सही दिशा दे और मंजिल तक पहुंचने का रास्ता दिखा सके। दिल्ली के शाहपुर जाट की खेल धरती पर मनोज पवार की कहानी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक यात्रा है—एक ऐसे खिलाड़ी की, जिसने स्वयं संघर्षों से निकलकर मुकाम हासिल किया और अब अपनी ऊर्जा नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने में लगा रहे हैं। शाहपुर जाट बॉक्सिंग सेंटर आज दिल्ली के विभिन्न इलाकों से आने वाले 100 से अधिक लड़के और लड़कियों के लिए प्रशिक्षण और सपनों का केंद्र बन चुका है। इस सेंटर की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे वहां के इंचार्ज एवं बॉक्सिंग कोच मनोज पवार का वर्षों का खेल अनुभव, अनुशासन, मेहनत और युवा खिलाड़ियों के प्रति समर्पण बड़ी वजह है।
खेल के प्रति आकर्षण ने दिखाई पहली राह
मनोज पवार की खेल यात्रा बचपन से ही शुरू हो गई थी। शाहपुर जाट के कई खिलाड़ी जब स्टेडियम जाकर बॉक्सिंग, एथलेटिक्स और जूडो का अभ्यास करते थे, तो उन्हें देखकर मनोज के भीतर भी खेल के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। शुरुआत उन्होंने बॉक्सिंग से नहीं, बल्कि जूडो से की। कोच गोगी सर के मार्गदर्शन में उन्होंने जूडो का प्रशिक्षण लिया और प्रथम सब-जूनियर नेशनल जूडो चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। इस प्रतियोगिता में पदक जीतने के साथ ही वे जूडो के इंडिया कैंप तक पहुंचे। यह उनके खेल जीवन का पहला बड़ा पड़ाव था और यहीं से उन्हें महसूस हुआ कि खेल केवल शौक नहीं, बल्कि उनके जीवन की दिशा बन सकता है। हालांकि परिस्थितियों ने उन्हें आगे चलकर जूडो छोड़कर बॉक्सिंग अपनाने के लिए प्रेरित किया। शाहपुर जाट के वरिष्ठ खिलाड़ी अशोक पवार, जो वर्तमान में रेलवे में कार्यरत हैं, के साथ उन्होंने बॉक्सिंग की शुरुआत की। कुछ समय तक नेशनल स्टेडियम में अभ्यास करने के बाद जब शाहपुर जाट में बॉक्सिंग क्लब शुरू हुआ, तो कोच बृंदर शुक्ला के मार्गदर्शन में उन्होंने नियमित रूप से बॉक्सिंग प्रशिक्षण शुरू किया।
यहीं से शुरू हुआ वह सफर, जिसने आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर का मुक्केबाज बनाया।
संघर्षों के बीच खुद बनाई पहचान
मनोज पवार का खेल सफर किसी तैयार मंच पर नहीं शुरू हुआ था। परिवार में खेल की कोई विशेष पृष्ठभूमि नहीं थी। पिता को भी खेलों की ज्यादा जानकारी नहीं थी और परिवार के बड़े बेटे होने के कारण उन्हें अपने रास्ते खुद तलाशने पड़े। खेल में आगे बढ़ते हुए उन्हें कई बार निराशाओं का सामना करना पड़ा। जिन खिलाड़ियों को उन्होंने प्रतियोगिताओं में हराया था और उनके कई जूनियर खिलाड़ियों को रेलवे जैसे संस्थानों में नौकरी के अवसर मिल गए, लेकिन उन्हें वह मौका नहीं मिल पा रहा था जिसकी वे लंबे समय से तलाश कर रहे थे। ऐसे समय में निराश होना स्वाभाविक था। लेकिन मनोज पवार ने परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने खेल छोड़ा नहीं, मेहनत कम नहीं की और अवसर का इंतजार करने के बजाय अपने प्रदर्शन को लगातार बेहतर बनाने पर ध्यान दिया। आखिरकार उनकी मेहनत ने वह अवसर पैदा किया जिसका उन्हें इंतजार था।
स्पोर्ट्स कोटे से दिल्ली सरकार में नियुक्ति
वर्ष 1999 में दिल्ली सरकार में स्पोर्ट्स कोटे के तहत बॉक्सर की वैकेंसी निकली। ट्रायल में अपने प्रदर्शन के दम पर मनोज पवार का चयन हुआ और उन्हें दिल्ली सरकार में खेल कोटे से नियुक्ति मिली। यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। जिस संघर्ष के दौरान उन्हें नौकरी के अवसरों के लिए इंतजार करना पड़ा था, उसी संघर्ष ने उन्हें और मजबूत बनाया। सरकारी सेवा में आने के बाद भी उन्होंने खेल से अपना रिश्ता कभी खत्म नहीं होने दिया। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते, नेशनल गेम्स में पदक हासिल किए और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे ओलंपिक और एशियन गेम्स के कैंपों का भी हिस्सा रहे। जूनियर वर्ग में उन्हें बेस्ट बॉक्सर और मोस्ट प्रॉमिसिंग बॉक्सर जैसे सम्मान प्राप्त हुए तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने पदक अपने नाम किए। एक खिलाड़ी के रूप में उनका अनुभव केवल पदकों तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग स्तर की प्रतियोगिताओं, कैंपों और प्रशिक्षण व्यवस्थाओं ने उन्हें खेल की बारीकियों को समझने का अवसर दिया, जिसका लाभ आज वे अपने प्रशिक्षुओं को दे रहे हैं।
आठ खेलों में ऑल इंडिया सिविल सर्विसेज स्तर पर प्रतिनिधित्व
मनोज पवार के खेल जीवन की एक बेहद खास उपलब्धि यह भी है कि वर्ष 2000 से अब तक उन्होंने दिल्ली सरकार/दिल्ली प्रशासन की ओर से ऑल इंडिया सिविल सर्विसेज गेम्स में आठ अलग-अलग खेलों में भाग लिया है। इन खेलों में बॉक्सिंग, एथलेटिक्स, क्रिकेट, स्विमिंग, बास्केटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन और टेनिस शामिल हैं। एक ही खिलाड़ी का इतने लंबे समय तक सरकारी सेवा में रहते हुए आठ अलग-अलग खेलों में ऑल इंडिया सिविल सर्विसेज स्तर पर प्रतिनिधित्व करना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है। यह न केवल उनके बहुआयामी खेल कौशल को दर्शाता है, बल्कि उनकी फिटनेस, अनुशासन, सीखने की क्षमता और खेलों के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है। उनके लिए खेल किसी एक विधा तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग खेलों से जुड़े अनुभव ने उनकी खेल समझ को और व्यापक बनाया। यही अनुभव आज उन्हें युवा खिलाड़ियों के प्रशिक्षण में भी मदद करता है।
नौकरी मिली तो खेल से रिश्ता और मजबूत हुआ
स्पोर्ट्स कोटे से सरकारी सेवा में आने के बाद मनोज पवार ने अलग-अलग विभागों में अपनी सेवाएं दीं। वर्तमान में शिक्षा विभाग से जुड़े होने के बावजूद उनका खेलों से जुड़ाव लगातार बना रहा। उनकी इच्छा थी कि खेल कोटे से सरकारी सेवा में आने के कारण वे शिक्षा विभाग के माध्यम से खेलों के विकास में अपना अधिकतम योगदान दें। विशेष रूप से बॉक्सिंग के प्रति उनका लगाव उन्हें लगातार नई प्रतिभाओं के बीच काम करने के लिए प्रेरित करता रहा। उनकी खेल विशेषज्ञता, अनुभव और समर्पण को देखते हुए डायरेक्टोरेट ऑफ एजुकेशन की स्पोर्ट्स ब्रांच ने उन्हें शाहपुर जाट बॉक्सिंग सेंटर की जिम्मेदारी सौंपी।
पिछले लगभग दो वर्षों से वे इस सेंटर को पूरी मेहनत और लगन से संचालित कर रहे हैं।
शाहपुर जाट बॉक्सिंग सेंटर बना प्रतिभाओं का नया ठिकाना
आज शाहपुर जाट बॉक्सिंग सेंटर की तस्वीर बदल चुकी है। यहां 100 से अधिक लड़के और लड़कियां नियमित रूप से बॉक्सिंग का प्रशिक्षण ले रहे हैं। इन खिलाड़ियों में सिर्फ शाहपुर जाट के बच्चे ही नहीं हैं। पालम, डाबरी, बदरपुर, छतरपुर, साकेत, तुगलकाबाद एक्सटेंशन, चिराग दिल्ली सहित दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों और दूर-दराज के इलाकों से भी युवा यहां प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं। इन बच्चों के लिए यह सेंटर सिर्फ प्रशिक्षण स्थल नहीं, बल्कि अपने खेल सपनों को आकार देने का मंच बनता जा रहा है। मनोज पवार का मानना है कि प्रतिभा की कमी कहीं नहीं है। जरूरत है तो प्रतिभा को पहचानने, उसे सही प्रशिक्षण देने, अनुशासन सिखाने और प्रतियोगिताओं में अवसर उपलब्ध कराने की। इसी सोच के साथ वे खिलाड़ियों को केवल पंचिंग और तकनीक नहीं सिखाते, बल्कि उन्हें खेल के अनुशासन, फिटनेस, मानसिक मजबूती और प्रतियोगिता की तैयारी के महत्व को भी समझाते हैं।
जिस गांव ने खिलाड़ी बनाया, उसी गांव को प्रतिभाएं लौटाने का संकल्प
मनोज पवार के लिए शाहपुर जाट सिर्फ एक स्थान नहीं, बल्कि उनकी खेल यात्रा की जन्मभूमि है। उन्होंने इसी क्षेत्र में खिलाड़ियों को अभ्यास करते देखा, यहीं से खेल के प्रति आकर्षित हुए और यहीं से अपने संघर्ष की शुरुआत की। इसलिए आज जब उन्हें इसी क्षेत्र की युवा प्रतिभाओं के साथ काम करने का अवसर मिला है, तो वे इसे केवल एक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि अपने गांव के प्रति एक तरह की वापसी के रूप में देखते हैं। उनकी कोशिश है कि जिन परिस्थितियों का सामना उन्हें अपने शुरुआती दिनों में करना पड़ा, आज के खिलाड़ियों को वैसी कठिनाइयों से कम से कम गुजरना पड़े। बच्चों को प्रशिक्षण मिले, प्रतियोगिताओं का अनुभव मिले और योग्य खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के अवसर मिलें—इसी उद्देश्य के साथ वे लगातार काम कर रहे हैं।
प्रोफेशनल बॉक्सिंग को बढ़ावा देने में भी निभा रहे भूमिका
मनोज पवार की खेल यात्रा केवल एमेच्योर बॉक्सिंग तक सीमित नहीं रही। वर्ष 2015 में भारत में प्रोफेशनल बॉक्सिंग के क्षेत्र में नई शुरुआत के दौरान ब्रिगेडियर मुरली धरन राजा, जो इंडियन बॉक्सिंग काउंसिल (IBC) के COO हैं, ने उन्हें नॉर्थ जोन की जिम्मेदारी सौंपी। तब से वे इस जिम्मेदारी को निभाते हुए भारत में प्रोफेशनल बॉक्सिंग को बढ़ावा देने और खिलाड़ियों को इस क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए कार्य कर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन और प्रयासों से जुड़े कई मुक्केबाज प्रोफेशनल बॉक्सिंग में अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस तरह मनोज पवार की भूमिका एक खिलाड़ी और कोच तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे बॉक्सिंग के प्रशासनिक और विकासात्मक पक्ष से भी जुड़े रहे हैं।
खिलाड़ी से कोच और अब प्रतिभाओं के निर्माता
मनोज पवार की कहानी को सिर्फ एक मुक्केबाज की सफलता की कहानी कहना शायद अधूरा होगा। यह एक ऐसे खिलाड़ी की कहानी है जिसने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया, अवसर के लिए इंतजार किया लेकिन मेहनत करना नहीं छोड़ा और सफलता मिलने के बाद अपनी ऊर्जा अगली पीढ़ी को तैयार करने में लगा दी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी से लेकर सरकारी सेवा में अपनी जिम्मेदारियां निभाने और फिर युवा मुक्केबाजों को प्रशिक्षित करने तक उनका सफर कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक है। आज शाहपुर जाट बॉक्सिंग सेंटर में जब कोई बच्चा ग्लव्स पहनकर रिंग में उतरता है, तो उसके पीछे केवल एक कोच का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि उस कोच के दशकों के अनुभव, संघर्ष और सीख का सार भी होता है। मनोज पवार जानते हैं कि हर बच्चा चैंपियन नहीं बनता, लेकिन हर प्रतिभाशाली बच्चे को चैंपियन बनने का अवसर जरूर मिलना चाहिए। यही सोच उन्हें रोज मैदान में वापस लेकर आती है।
भविष्य का लक्ष्य—शाहपुर जाट से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिंग तक
मनोज पवार का अगला लक्ष्य स्पष्ट है—शाहपुर जाट और आसपास के क्षेत्रों से अधिक से अधिक प्रतिभाशाली मुक्केबाज तैयार करना और उन्हें दिल्ली, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंचाना।वे चाहते हैं कि यह सेंटर आने वाले समय में ऐसे खिलाड़ियों की पहचान बने, जहां से निकलने वाले मुक्केबाज दिल्ली और देश का प्रतिनिधित्व करें।उनका विश्वास है कि यदि खिलाड़ी को सही समय पर सही मार्गदर्शन, अनुशासन, प्रशिक्षण और अवसर मिल जाए, तो वह किसी भी बड़े मंच पर अपनी पहचान बना सकता है।शाहपुर जाट की गलियों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिंग तक पहुंचे मनोज पवार अब अपनी अगली पीढ़ी को वही रास्ता दिखा रहे हैं। उनका जीवन बताता है कि संसाधनों की कमी मंजिल की राह रोक सकती है, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति, ईमानदार मेहनत और जुनून हो तो संघर्ष ही सफलता की सबसे मजबूत सीढ़ी बन जाता है।
मनोज पवार के शब्दों में
“प्रतिभा हर जगह है। उसे पहचानकर सही दिशा, सही प्रशिक्षण और सही अवसर देना हमारी जिम्मेदारी है।”
शायद यही वह सोच है, जिसने शाहपुर जाट बॉक्सिंग सेंटर को महज एक प्रशिक्षण केंद्र से आगे बढ़ाकर नई खेल प्रतिभाओं के सपनों का मंच बना दिया है।
संपादक :- संजीव दत्ता
दूरभाष :- 9971999864
प्रायोजन के लिए /For sponsorship : khelkhiladi55@gmail.com

गर्व है हमें शाहपुर जाट के इस शेर पर
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