भारतीय बॉक्सिंग के महान शिल्पकार एस. आर. सिंह
खिलाड़ी से द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता तक एक गुरु की ऐसी गाथा, जिसने कई पीढ़ियों के चैंपियन गढ़े भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका मूल्यांकन केवल उनके पदों, पुरस्कारों अथवा व्यक्तिगत उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। उनका वास्तविक कद उन खिलाड़ियों की सफलताओं में दिखाई देता है, जिन्हें उन्होंने अपनी तपस्या, अनुभव और अनुशासन से तैयार किया। स्वतंत्र राज सिंह, जिन्हें बॉक्सिंग जगत में सम्मान और स्नेह से एस. आर. सिंह के नाम से जाना जाता है, भारतीय मुक्केबाजी के ऐसे ही महान शिल्पकार हैं। चार दशकों से अधिक समय तक मुक्केबाजी से जुड़े रहे एस. आर. सिंह ने स्वयं खिलाड़ी के रूप में रिंग की कठिनाइयों को महसूस किया और बाद में प्रशिक्षक बनकर असंख्य खिलाड़ियों को सफलता की राह दिखाई। उन्होंने प्रतिभाओं को केवल मुक्केबाज नहीं बनाया, बल्कि उनमें प्रतिस्पर्धा का आत्मविश्वास, अनुशासन, तकनीकी दक्षता और विजेता बनने की मानसिकता विकसित की। उनकी कोचिंग विरासत का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 12 ओलंपियनों और 13 अर्जुन पुरस्कार विजेताओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी दशकों की साधना को राष्ट्रीय मान्यता तब मिली, जब भारत सरकार ने वर्ष 2015 में उन्हें बॉक्सिंग के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट श्रेणी में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया। 29 अगस्त 2015 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। लेकिन एस. आर. सिंह की कहानी केवल द्रोणाचार्य पुरस्कार तक सीमित नहीं है। यह कहानी एक ऐसे बालक से शुरू होती है, जिसने विद्यालय के दिनों में दोस्तों के साथ हाथों में तौलिया बांधकर की जाने वाली दोस्ताना लड़ाई को धीरे-धीरे खेल के अनुशासन में बदला और आगे चलकर भारतीय बॉक्सिंग के महान गुरुओं में अपना स्थान बनाया।
एस. आर. सिंह का जन्म करनाल में हुआ। उनका परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के गुजरांवाला क्षेत्र से विस्थापित होकर हरियाणा के करनाल में आकर बसा था। उनके पिता किसान थे। सीमित साधनों और सामान्य ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े एस. आर. सिंह के जीवन में खेल किसी योजनाबद्ध करियर की तरह नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बनता चला गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल कुंजपुरा में हुई। यहीं से मुक्केबाजी के प्रति उनके मन में आकर्षण पैदा हुआ। विद्यालय के दिनों में वे अपने मित्रों के साथ हाथों में तौलिया बांधकर आपस में मुक्केबाजी जैसी मस्ती किया करते थे। यही बालसुलभ शौक धीरे-धीरे खेल के प्रति गंभीर रुचि में बदल गया। मुक्केबाजी के प्रति बढ़ते आकर्षण ने उन्हें अभ्यास, अनुशासन और प्रतियोगिताओं की ओर अग्रसर किया। सैनिक स्कूल कुंजपुरा की ओर से उन्होंने इंटर-स्कूल प्रतियोगिता, जालंधर में भाग लिया और पदक हासिल किया। यह उनके लिए केवल एक पदक नहीं था, बल्कि उस यात्रा का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव था, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय बॉक्सिंग का प्रतिष्ठित प्रशिक्षक बनाया।
एस. आर. सिंह ने खिलाड़ी के रूप में अपनी प्रतिभा को लगातार निखारा। वे ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियन और राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज रहे। रिंग में उतरकर मुकाबला करने के अनुभव ने उन्हें मुक्केबाजी की उन बारीकियों को समझने का अवसर दिया, जो बाद में उनकी कोचिंग शैली की सबसे बड़ी ताकत बनीं। उन्होंने समझा कि मुक्केबाजी केवल शारीरिक शक्ति का खेल नहीं है। एक सफल मुक्केबाज के लिए तकनीक, गति, फुटवर्क, टाइमिंग, दूरी की समझ, रणनीति, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन समान रूप से आवश्यक हैं। इसी सोच ने आगे चलकर उनके प्रशिक्षण दर्शन को आकार दिया। वर्ष 1977 में एनआईएस पटियाला से प्रशिक्षक का कोर्स करना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। खिलाड़ी के अनुभव और प्रशिक्षक के वैज्ञानिक प्रशिक्षण ने उनके व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया। अब उनका लक्ष्य स्वयं जीतना भर नहीं था, वे ऐसी प्रतिभाओं को तैयार करना चाहते थे, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें। यहीं से एक खिलाड़ी की यात्रा धीरे-धीरे एक गुरु की यात्रा में परिवर्तित होने लगी।
भारतीय बॉक्सिंग से उनका सक्रिय जुड़ाव 1980 के दशक में और मजबूत हुआ। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय टीमों, शिविरों और विभिन्न आयु वर्गों के खिलाड़ियों के साथ लंबे समय तक काम किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी प्रतिभा को समय रहते पहचान लेना। वे खिलाड़ी के भीतर छिपी क्षमता को समझते और फिर उसकी कमजोरियों को दूर करते हुए उसकी ताकत को विकसित करने पर ध्यान देते थे। उनके लिए हर खिलाड़ी एक जैसा नहीं था। वे उसकी शारीरिक क्षमता, तकनीकी शैली, मानसिक स्थिति और मुकाबले की प्रकृति को समझकर प्रशिक्षण देने में विश्वास रखते थे। उनकी इसी दक्षता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और वर्ष 1991 में उन्हें भारत का सर्वश्रेष्ठ कोच चुना गया। यह सम्मान उनके कोचिंग जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि था। लेकिन उनके लिए किसी पुरस्कार से अधिक महत्वपूर्ण उनके खिलाड़ियों की सफलता थी।
एस. आर. सिंह के कोचिंग जीवन में धर्मेंद्र सिंह यादव का नाम विशेष महत्व रखता है। धर्मेंद्र सिंह यादव ने बेहद कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और उनकी इस यात्रा में एस. आर. सिंह के प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष 1989 में बीजिंग में आयोजित सीनियर एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में धर्मेंद्र सिंह यादव ने मात्र 16 वर्ष 6 महीने की उम्र में हिस्सा लिया और कांस्य पदक हासिल किया। इसके बाद वर्ष 1990 के कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने कांस्य पदक जीता। वर्ष 1990 में मुंबई में आयोजित सीनियर वर्ल्ड कप में वे सेमीफाइनल तक पहुंचे। इसके अगले ही वर्ष, मात्र 19 वर्ष की उम्र में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।एक युवा प्रतिभा को इतनी कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों के लिए तैयार करना एस. आर. सिंह की कोचिंग क्षमता का प्रमाण था। वे केवल खिलाड़ी की वर्तमान क्षमता नहीं देखते थे, बल्कि उसके भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उसे भविष्य के चैंपियन के रूप में विकसित करने पर विश्वास करते थे। किसी प्रशिक्षक की वास्तविक पहचान उसके स्वयं के पदकों से कहीं अधिक उसके शिष्यों की उपलब्धियों से होती है। इस कसौटी पर एस. आर. सिंह का योगदान असाधारण दिखाई देता है। उन्होंने 12 ओलंपियनों और 13 अर्जुन पुरस्कार विजेताओं को तैयार करने में योगदान दिया। उनके प्रशिक्षण से जुड़े खिलाड़ियों में धर्मेंद्र सिंह यादव, गोपाल देवांग, मनोज पिंगले, मुकुंद किलेदार, सीरा जयराम, जितेंद्र कुमार और मोहम्मद अली क़मर जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियाँ केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानियां नहीं हैं, बल्कि उस प्रशिक्षण परंपरा का प्रमाण हैं जिसे एस. आर. सिंह ने वर्षों की मेहनत से विकसित किया। उनके लिए खिलाड़ी केवल एक प्रतियोगी नहीं था। वह भारतीय बॉक्सिंग के भविष्य का प्रतिनिधि था।
एस. आर. सिंह की गुरु-शिष्य परंपरा
की सबसे प्रेरणादायी कड़ियों में जयदेव बिष्ट का नाम लिया जाता है। जयदेव
बिष्ट उनके प्रशिक्षित शिष्यों में रहे और बाद में स्वयं एक सफल प्रशिक्षक बने।
वर्ष 2009 में जयदेव बिष्ट को द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह
उपलब्धि एस. आर. सिंह की कोचिंग विरासत का विशेष प्रमाण है। किसी गुरु के लिए इससे
बड़ी उपलब्धि शायद ही कोई हो सकती है कि उसका शिष्य स्वयं आगे बढ़कर खिलाड़ियों की
नई पीढ़ी तैयार करने वाला गुरु बन जाए। इस प्रकार एस. आर. सिंह की शिक्षा केवल
रिंग तक सीमित नहीं रही, उनकी प्रशिक्षण
परंपरा उनके शिष्यों के माध्यम से आगे बढ़ती रही।
एस. आर. सिंह की कोचिंग का एक
महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि उन्होंने केवल सीनियर खिलाड़ियों पर ध्यान केंद्रित
नहीं किया। उन्होंने जूनियर और युवा मुक्केबाजों को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए
तैयार किया। उनके प्रशिक्षण से जुड़े प्रवीण कुमार ने वर्ष 2000 में बुडापेस्ट, हंगरी में आयोजित यूथ वर्ल्ड
चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। इसी प्रकार बलवीर सिंह ने
वर्ष 2003 में जूनियर/कैडेट वर्ल्ड चैंपियनशिप में
भारत के लिए स्वर्ण पदक हासिल किया। जमीनी स्तर की प्रतिभाओं को पहचानकर
उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना एस. आर. सिंह की प्रशिक्षण प्रणाली का
महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
एस. आर. सिंह का योगदान केवल
राष्ट्रीय टीमों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने दिल्ली बॉक्सिंग टीम
को मजबूत करने में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। वर्ष 1991 में उनके प्रशिक्षण में दिल्ली की टीम ने आइजोल, मिजोरम
में आयोजित जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में पहली बार सर्विसेज टीम को पराजित कर खिताब हासिल किया। यह दिल्ली की
नागरिक बॉक्सिंग के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी। इस सफलता ने साबित किया कि यदि
प्रतिभाओं को सही मार्गदर्शन,
वैज्ञानिक प्रशिक्षण और निरंतर अभ्यास मिले तो वे स्थापित टीमों को
भी चुनौती दे सकती हैं। इन्होने ने भारतीय टीमों के साथ कई राष्ट्रीय और
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रशिक्षक की भूमिका निभाई। वर्ष 1989 की बीजिंग सीनियर एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने भारतीय टीम के साथ काम किया, जहां
भारत ने कुल छह पदक हासिल किए। इसके अलावा 1995 यूथ एशियन
चैंपियनशिप, 2006 जूनियर एशियन चैंपियनशिप और 2013 जूनियर एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप जैसी
प्रतियोगिताओं में भी उनके प्रशिक्षण से जुड़े खिलाड़ियों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन
किया। वर्ष 2017 में वे भारतीय पुरुष बॉक्सिंग टीम के
कोचिंग दल का हिस्सा रहे और यूरोप में
भारतीय पुरुष टीम के एक्सपोजर तथा ग्रां प्री प्रतियोगिता में कोच की जिम्मेदारी
निभाई। जनवरी 2017 में एस. आर. सिंह को भारतीय पुरुष
बॉक्सिंग के मुख्य कोच की महत्वपूर्ण
जिम्मेदारी सौंपी गई। भारतीय बॉक्सिंग में उस समय अलग-अलग राष्ट्रीय शिविरों की
व्यवस्था की गई थी। एस. आर. सिंह को पटियाला शिविर की जिम्मेदारी दी गई, जबकि दूसरा शिविर औरंगाबाद में संचालित हुआ। एक अनुभवी प्रशिक्षक को इस
महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का मिलना इस बात का प्रमाण था कि भारतीय बॉक्सिंग प्रशासन
उनके लंबे अनुभव, तकनीकी समझ और खिलाड़ियों को तैयार करने की
क्षमता पर विश्वास करता था।
एस. आर. सिंह का प्रशिक्षण अनुभव
पुरुष मुक्केबाजी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने महिला मुक्केबाजों की प्रतिभाओं को
भी अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए तैयार किया। वर्ष 2014 में एआईबीए महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप, जेजू के लिए उन्होंने शमजेतसाबम
सरजुबाला और सवीटी जैसी प्रतिभाओं को प्रशिक्षण दिया। यह उनके
व्यापक कोचिंग अनुभव को दर्शाता है कि वे विभिन्न वर्गों के खिलाड़ियों की
आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण देने में सक्षम थे।
वर्ष 2015 एस. आर. सिंह के जीवन का ऐतिहासिक वर्ष बन गया। भारत सरकार ने
उन्हें बॉक्सिंग के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार की लाइफटाइम अचीवमेंट श्रेणी
में सम्मानित किया। 29
अगस्त 2015 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान केवल एस. आर. सिंह की
व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था। इसके पीछे वर्षों की तपस्या, राष्ट्रीय
शिविरों में बिताए अनगिनत घंटे, खिलाड़ियों के साथ निरंतर
अभ्यास, प्रतियोगिताओं की तैयारी और भारतीय बॉक्सिंग को
मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता थी। द्रोणाचार्य पुरस्कार ने उस गुरु की साधना को
राष्ट्रीय पहचान दी, जिसने स्वयं से अधिक अपने शिष्यों की
सफलता को महत्व दिया। उनकी प्रशिक्षण
पद्धति का आधार था, प्रतिभा की पहचान, अनुशासन की दृढ़ता, तकनीक की शुद्धता, अभ्यास
की निरंतरता, मानसिक मजबूती, और मुकाबले की परिस्थितियों को समझने की क्षमता उनका
मानना था कि मुक्केबाज को केवल पंच मारना नहीं आना चाहिए, बल्कि
उसे यह भी समझना चाहिए कि कब आक्रमण करना है, कब बचाव करना है, दूरी कैसे बनानी है, प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी कैसे पहचाननी है और मुकाबले की बदलती
परिस्थितियों के अनुसार रणनीति कैसे बदलनी है। यही कारण है कि उनके प्रशिक्षण से निकले खिलाड़ियों ने विभिन्न भार वर्गों
और अलग-अलग शैली में सफलता हासिल की।
एस. आर. सिंह के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके पारिवारिक परिवेश को जानना भी आवश्यक है। उनके पिता किसान थे और पाकिस्तान के गुजरांवाला से विस्थापित होकर परिवार ने हरियाणा के करनाल में नई जिंदगी शुरू की। उनके दो बड़े भाई उलपेन्द्र राज सिंह और उपेन्द्र राज सिंह रहे, जबकि बहन कुलजीत राज कौर हैं। परिवार के इस संघर्षशील परिवेश ने एस. आर. सिंह के व्यक्तित्व में मेहनत, सादगी और संघर्ष के प्रति सम्मान पैदा किया। उनका पारिवारिक जीवन भी उनकी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। श्रीमती सुखजिंदर कोर पत्नी, जितेंदर राज पुत्र और प्रभजोत कोर पुत्री के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए खेल के प्रति समर्पित रहे। उनके पुत्र ने भी मुक्केबाजी को अपना क्षेत्र बनाया और सफल मुक्केबाज के रूप में पहचान बनाई। आगे चलकर वे भारतीय खेल प्राधिकरण में मुक्केबाजी प्रशिक्षक के रूप में कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार बॉक्सिंग की वह परंपरा, जिसे एस. आर. सिंह ने अपने जीवन से सींचा, अगली पीढ़ी तक भी पहुंची।
एस. आर. सिंह की यात्रा को यदि तीन
शब्दों में समेटना हो तो वे होंगे संघर्ष, साधना और सफलता। एक छोटे से विद्यालयी अनुभव से शुरू हुआ मुक्केबाजी का
जुनून उन्हें रिंग तक ले गया। खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय पहचान मिली। वर्ष 1977 में एनआईएस
पटियाला से प्रशिक्षक का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी ऊर्जा खिलाड़ियों
को तैयार करने में लगा दी। समय के साथ वे राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षक बने,
भारतीय टीमों के साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में गए, सर्वश्रेष्ठ कोच का सम्मान प्राप्त किया, भारतीय
पुरुष बॉक्सिंग टीम के मुख्य कोच बने और अंततः द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित
हुए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पद या पुरस्कार नहीं है। उनकी सबसे बड़ी
उपलब्धि हैं, वे खिलाड़ी, जिन्होंने रिंग में भारत का गौरव बढ़ाया। एक महान खिलाड़ी अपने नाम के साथ पदक और रिकॉर्ड छोड़ जाता है, लेकिन एक महान गुरु अपने पीछे पूरी पीढ़ी छोड़ जाता है। उनके शिष्य ओलंपिक
तक पहुंचे, अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित हुए, एशियाई और विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीते और देश का
प्रतिनिधित्व किया। कुछ शिष्य आगे चलकर स्वयं प्रशिक्षक बने और उन्होंने नई
प्रतिभाओं को तैयार किया। यही गुरु-शिष्य परंपरा किसी प्रशिक्षक को इतिहास में
स्थायी स्थान देती है।
स्वतंत्र राज
सिंह 'एस. आर. सिंह' भारतीय
बॉक्सिंग के केवल प्रशिक्षक नहीं, बल्कि प्रतिभाओं के
शिल्पकार हैं।
उन्होंने स्वयं रिंग में उतरकर मुक्केबाजी को समझा और फिर अपने अनुभव को आने वाली
पीढ़ियों के निर्माण में लगा दिया। करनाल की मिट्टी से शुरू हुई उनकी यात्रा सैनिक
स्कूल कुंजपुरा के शुरुआती मुकाबलों से होते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
बॉक्सिंग के बड़े मंचों तक पहुंची। वर्ष 1977
में एनआईएस पटियाला से प्रशिक्षक का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने
जिस कोचिंग यात्रा की शुरुआत की, उसने भारतीय मुक्केबाजी की
कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। 12 ओलंपियनों और 13 अर्जुन
पुरस्कार विजेताओं को तैयार करने में योगदान, अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ियों को मार्गदर्शन, भारतीय टीमों के साथ लंबे समय तक कार्य और वर्ष 2015 का द्रोणाचार्य पुरस्कार लाइफटाइम अचीवमेंट उनकी
दीर्घकालीन साधना के साक्ष्य हैं। उनकी कहानी यह सिखाती है कि महानता केवल स्वयं
चैंपियन बनने में नहीं, बल्कि दूसरों को चैंपियन बनाने में
भी होती है। एस. आर. सिंह ने यही किया। उन्होंने मुक्केबाज तैयार किए, उनमें विजेता बनने का विश्वास जगाया और भारतीय बॉक्सिंग को ऐसी पीढ़ियां
दीं, जिनकी उपलब्धियों में आज भी उनके गुरु का परिश्रम दिखाई
देता है। उनका नाम इसलिए महान है कि उन्होंने केवल मुक्केबाज नहीं बनाए उन्होंने
चैंपियन बनने की संस्कृति गढ़ी। और शायद एक सच्चे गुरु की इससे
बड़ी पहचान कोई दूसरी नहीं हो सकती।
संपादक :- संजीव दत्ता
दूरभाष :- 9971999864
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